अभिलाषा (मैथिली कविता)
अभिलाषा
वैह वसात जँ फेरो बहितै
सभक हृदय के अंदर घुसितै
छल, प्रपंच, द्वेष, मैल आ ईर्ष्या
धकैल-धकैल क' बाहर करितै
सबक गला सब केओ मिलितै
श्रेष्ठ के नमन, कनिष्ठ के आशिष
दुखियाक दुख सं दुखित,द्रवित हो
हरण सबक पीड़ा के करितै
शीतल मंद मरुत मे कुसुमित
वन-उपवन सब सुरभित रहितै
खेत-पथार सब अन्न सं भरल
फल सं लादल बृक्ष जँ रहितै
नदी, नाल, झील ओ झरना
अमिय नीड़ लै कल कल करितै
पशु, चिड़ै , मानुष ओ जलचर
सभ निचैन भ' विचरण करितै
सभ मंदिर, गिरिजा ओ मस्जिद
प्रेमक किर्तन, अजान, सुनबितै
गर-बहियां द' चलितै सब कोई
वैह वसात जँ फेरो बहितै
वैह वसात जँ फेरो बहितै!
प्रमोद कुमार, उर्फ "नेहरू लाल दास"
पॉंडिचेरी
दि. 19-01-2019
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