मनु कें सीख (मैथिली बीहनि कथा)

मनु कें सीख 
                                       (मैथिली बीहनि कथा) 

हौ मनु! मनु! सुनै छ! 
की कहै छी बाबा।  कहू ने।  सुनिते त’ छी! 
हौ भोरे स मोन केना दन कय रहल अछि।  बिना बाते के हलदिली घुसल अछि। 
अहांक मोन शांते कखन रहैया।  भैर दिन खबखबायले रहैत छी। मनु कहलकै। “हौ सुनह! एकटा बात कहै छियह! “
की भैर दिन बात कहै छियह, बात कहै छियह, करैत रहै छी। आ बाजब सभटा अनर्गल बात सभ।  विना हाथ पैर के। 
हौ सुनि लै।  छह त’ कलयुगिये मनु ने। कलयुगे के संस्कार भेटल छह। हमर मोन कहैया’ जे फेर सं प्रलयकाल आवि रहल छै। प्रलय हेतै। जेना होइत अएलैया’ ओहिना हेतै। सबटा तहस -नहस। किछु नहिं बंचतै। गोटैक आधे लोक सब, एत्त ओत्त! फेर तोरे ने पृथ्वी पर मनुखक सभ्यता विकसित करै के भार भेटतह ! पिछला वेर त’ बुध आवि क’ मदद कैलखुन्ह।  अहि वेर हुनको आस नहिं।  ईन्द्रो त’ कलयुगिये छथि ने! सुनि ला’ हमर बात। नहिं त’ पछतेबह! 
“कहू की कहै छी। विना बाते डेरवै छी। “मनु कहलकै। 
हौ कहवी छै जे “रोपलहुं बीया बबूर के, आम कतय सं फरत! “तैं सुनि ले’! कलयुगही आदत छोड़ि सतयुगही आदत धरिह’ ! सौसे धर्मक राज्य फैलविह’,दया, करुणा सं सिंचाई कय प्रेमक क्यारी मे मानव धर्मक पौध लगविह’ ! नैतिकता कें उपर राखि हृदय कें पाइन सन निर्मल बनबिह’ !सतयुग, द्वापर, त्रेता मे जे सभ नीक लोक कि राजा भेलाह हुनके सम्मुख राखि सभ्यता संस्कृति विकसित करिह ‘!
ओह कत्तेक बोर करै छी बाबा! आव हम जाइछी।  
नहिं होउ! जाइ त’ हमछी। देखहक गड़गड़ेनाइ शुरू भेलै! अंतिम बात! “आमक आंठी रोपिह’ !बबूरक बीया नहिं। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 16-09-2019

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