चित्कार रहा फिर कौन
चीत्कार रहा फिर कौन
नीली छतरी के नीचे ही
चमक रहे हैं चांद सितारे
खग भी गा रहे वैसे ही
है चीत्कार रहा फिर कौन
क्यों सभी हैं मौन !
अग्नि प्रज्वलित कर दी ऐसी
कहीं न ज्वाला दिख रही है
भस्म कर रहा है सब कुछ
लेकिन भुगत रहा है कौन
क्यों सभी हैं मौन !
रात काली दिन भी काला
कहीं नहीं दिखता उजियारा
जिसने जना सभी जीवों को
उसके आंसू पोंछे कौन
क्यों सभी हैं मौन !
खग मृग पूछ रहे हैं नभ से
चन्द्र और तारे नील गगन से
एक ही धरती हरित भुवन में
कालिख पोत रहा है कौन
क्यों सभी हैं मौन !
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,10-6-2020
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