पिता हमारे ऐसे होते (हिन्दी कविता)
पिता हमारे ऐसे होते
खुद धूप में जलते होते
ठंढ़ा पानी हमें पिलाते
शितलहड़ी में कांपते होते
कम्बल मोटा हमें ओढ़ाते
पिता हमारे ऐसे होते।
न भूख सताती न वो थकते
पकड़ अंगुली साथ में चलते
राह में कंकड़ पत्थर आते
उठा कर दूर फेंकते रहते
पिता हमारे ऐसे होते।
गुरू दोस्त सहचर हैं मेरे
घोड़ा बनकर हाथी बनकर
पीठ चढ़ाकर हंसते गाते
हर मुश्किल आसान बनाते
पिता हमारे ऐसे होते।
सांस बसती बच्चों में उनकी
त्याग तपस्या की हैं मूर्ति
करें पिता की सेवा जब हम
जीवन सार्थक तभी हमारी
पिता हमारे ऐसे होते।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 10-09-2019
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