थोड़ा सा उजियारा कर दूं (हिन्दी कविता)

थोड़ा सा उजियारा कर दूं

ऐ हवा तू ठहर अभी
जला कर एक दीया
ले हाथ में चल पड़ा हूं
देख वहां, अंधा मत बन
तिमिर कितना घनघोर है
आंखें हैं फिर भी
ठोकर खा  गिर रहे वो
थोड़ा सा उजियारा कर दूं!

तू…! राहों में सजे पत्थर!!
गोल बन, किनारे लग जा!
देख! किसी के सांसों की डोरी
बस टूटी जाती है
मुट्ठी में हवा बांध 
चला हूं
थाम सकूं सांसों की डोरी
तुम मुझे गिरा मत देना!

ऐ मेरा चंचल मन !!
बहुत देर कर दी
अव इस ठांव पहुंचा हूं
स्थिर रहना
डोलना नहीं, डुलाना नहीं
कुछ तो अंधियारा चीरूं
कुछ सांसों को तो थामूं
मनुष्य हूं!
वैसा ही कुछ कर लूं!!!

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,4-02-2020

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