बृद्धक लाठी (मैथिली कविता)
बृद्धक लाठी
हे पथिक! कनि उठा लेब हमरा
ओतय पहुंचा देब!
नहिं! नञ ल’ जैब?
हँ हँ! अहां कियैक उठैब हमरा!
अहां एखन बूढ़ नञ ने भेलहुं अछि
केना बुझबै!
बृद्ध आ लाठिक रिश्ता!
हम बृद्धक लाठी छी
ओ चलैत छलाह
हमहूं चलैत छलहुं, हुनके संग!
हुनकर पैर थरथराइत छलनि
हाथो कंपैत छलनि हुनकर
हमहूं कंपैत छलहुं
कखनो क'
अचौके हुनकर मुँह पर बिचित्र
भाव अवैत छलनि
ठोर थरथराइन आ ओ
मुस्का दैत छलाह!
फेर कंपैत हाथ मे बल आवि जाइन
जोर सं हमरा पकैर लैथि
पैर के घिसटबैत चल’ लगै छलाह
हमहूं खट खट करय लगै छलहुं!
गली के कुक्कुर सभ चिन्ह गेल रहै
खट खट आ घिस घिस!
आंखि खोलि अपन नीन खराब नहिं करै
आई अचोके हमर पायर पिछरल
हम त’ आधा रहि गेलहुं
ओ समुच्चे चलि गेलाह!
ओतय देखै छियै!
आइगक लपलपाइत ज्वाला!
हमरा कात क'
ओही मे समा गेलथि ओ!
तईं हे पथिक!
हमरा हुनकर चिता पर फेक दिय'
कहियो हुनकर लाठी बनि जीलहुं
आव हुनकर काठी बनि संग देबनि!
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 06-07-2019
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