सुपक गोपी (मैथिली बीहनि कथा)

सुपक गोपी
                     (मैथिली बीहनि कथा)

सड़क काते मे आमक गाछी आ सबसं पहिले सिनुरिया आमक गाछ। दाना छोट छोट, घौरछे घौरछे आ सब साल सोहैर क' फरनाई ओकर विशेषता रहै! आन आम सब अखन बनाइते रहैत छलै कि सिनुरिया गाछ लाले लाल! 
एकटा आम छिनगी पर रहै जे आधा लाल आ आधा पियर! छौंड़ा सभक नजरि परि गेलै!अनघोल मचि गेलै! “ सिनुरिया पाकय लगलै, सिनुरिया पाकय लगलै!” अमित, अनिल के बजा अनलकै! अनिल देख क' कहलकै, “ ई त' एकदम सुपक गोपी छै! “
ढेपा, रोड़ा, ताबड़ तोड़ चलय लागल! कनिञें टा सब छौंड़ा आ हाथो एतनी एतनी ! ककरो ढेपा आम तक नहिं जुमै ! कांच आमक पथार लागि गेलै।
किम्हरो सं बतहा चच्चा ऐलखिन! की भेलैन्ह से नहिं जानि मुदा जहिया सं नौकड़ी छुटलैन्ह तहिया सं एहने। निशाना अखनों पक्का! झटहा रहौ कि ढेपा, एक नहिं त' दोसर प्रयास काफी ! आम के टुटि क' निचा गिरनाइ निश्चित। ढेपा फेकलखिन आ सुपक गोपी निचा खसलाह! छौंड़ा सब चिचिया क' दौड़ल! पता नहिं किमहर सं बड़की काकी एलखिन आ दूगो बात कथा कहैत सुपक गोपी के उठा चलि देलखिन!
पहिल वेर सब देखलकै,” बतहा चच्चा के आंखिक कोर भिजल छलन्हि”!

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,27-01-2020

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