झाम लाल (मैथिली व्यंग कविता)

झाम लाल

छैथ  एकटा  बुढ़ा   झाम  लाल
उमर  छैन्ह   यैह  पैंसठ   साल
आंखिक  सीसा  मोट  मोट आ
भितर  धंसल  छैन्ह  दुनु  गाल
                       एकटा बूढ़ा झाम लाल।

दिन  भरि  खैनी  चुनबैत  रहता
चश्मा  पोछि  क'   देखैत  रहता
कोइ जे कनिञों जोर सं बाजल
हेता   तामसे    पित्ते लाले लाल
                          एकटा बूढ़ा झाम लाल ।

ठिठुरैत जार  रहौ कि  गर्मी  तेज
देह मे सौंसे  छछारता करू  तेल
साबुन   सं  ओ  घृणा  करै  छथि
हरदम  गमछा  रखता लाले लाल
                            एकटा बुढ़ा झाम लाल ।

नौत  पिहान  लै  ब्याकुल  रहता
आ  सबहक  पाछा वैह पहुंचता
टंटा  टोटका   क'  गाल  फुलौता
सब  बुझै   छैन्ह   हुनकर   चाल
                            एकटा बूढ़ा झाम लाल ।

दाही  रहौ   कि   सुखार  भयंकर
हुनका नहिं होइन्ह  चिंता  ओकर
तेहेन  ने   पेंच   लगवै   छथि  जे
भ'  जाइ  छैन्ह  सब  गोटी  लाल
                             एकटा बूढ़ा झाम लाल।

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,24-05-2020

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