हम नहिं जायब (मैथिली बीहनि कथाक)

हम नहिं जायब 
                          (बीहनि कथा) 

(मित्रलोकनि, हमरा अही बीहनि कथा पर," गीताश्री प्रकाशन,पटना द्वारा द्वितीय पुरस्कार भेट ' लै। ओना ई कथा हम पहिनहुं फेसबुक पर पोस्ट कय चुकल छी। पुनः अवलोकनार्थ।)

मोटरी चोटरी बन्हा गेल छलै। मनोहरक माय काल्हिये सं सभ सं भेंट करै पाछू बेहाल छथि। घेंट मे घेंट जोरि, फफा फफा क’ कानि कानि आंखि लाल कैयने छथि। मनोहर के पिताजिक श्राद्ध कर्म सब निपटि गेलनि । मनोहरक माय आव कोना रहती एसगर। मनोहर भावुक भय एकतरफा फैसला सुना देलखिन जे माय हमरे सब संगें दिल्ली जायत। 
एमहर मनोहरक कनिञा फुइल क’ कुप्पा! ओहो अपन फैसला सुना देलखिन। मां के ल’ जेबनि त’हम नहिं जायब। मनोहर बाबू आव की करताह। किंकर्तव्यविमूढ छथि। 
भोरे पांचे बजे माय लग आवि बैसलाह। माय पुछलखिन्ह, “की भेलौ वाऊ?  नीन नहिं होइ छौ।  गाड़ी त बारह बजे छै ने। अखने सं हलदिली कियै। हं! छैं  त’ बापे के बेटा ने। हुनको गाड़ी पकरै काल हलदिली सन्हिया जाय छलनि! “
एतवा कहि मनोहरक माय आंखि पोछ’ लगलिह। 
माय गइ,”तोरा चलै मे त’ कोनो दिक्कत नहिं ने छौ? “ कहैत रही गठिया -बातरस भ’गेलै “
“नहिं कोनो खास नहिं।“मनोहरक माय कहलखिन। “
कियै पुछलह! “नहिं मंदिर यैह कनि दूर छै तैं।“मनोहर कहलखिन्ह। 
तों आ बुचिया एक संगें जमीन पर सूइत रहबिही ने? पलंग एक्केटा छै। 
हं हं कोनो बात नहिं। तों चिंता नहिं करह।  हम निमाहि लेव। 
खर्चा बढ़ि गेलैया’ तैं बुचिया के माय सेहो नौकड़ी पर जाइ छथिन। दिन मे गैस चुल्हा जरा क’ खेनाइ बना लेबही ने? 
मनोहर के माय के आव बुझ' मे  भांगठ नहिं रहलैन। 
कहलखिन, “एतेक दिक्कत छै त’ जाह तों सभ।  हम एत्तहि रहब। नहिं जैब। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी

Comments