मनोरथ (मैथिली बीहनि कथा)

मनोरथ 
            (बीहनि कथा) 

बाप रे बा! केहन गर्मी छलै! मोन अपसियांत छल। हे देखियौ ने!  केहन शीतल हवा बहि रहल छै! 
बादलो लाइग गेलैया! 
हूं से की? अहि में कोन अजगुत? कोनो पहिल दिन त’ नहिं भेलैया ‘एहन! 
हे! सुनु ने!  अहांक हाथ मे आंटा लागल अछि। लट सभ मुंह पर हिल डोइल रहल अछि। सोझरा दिय’ हम! 
सोझरा दिय ‘! कतेक सुन्दर अहांक केश अछि! कारी कारी,  घनगर! तहि पर सं सुगंधित! सच कहै छी। आई जँ हम कवि रहितहुं त कालिदास की, हुनको सं नीक कविता लिखतहुं। अहां छी हे तेहन सुन्दरि! 
ठोढ़ पर हुनका कनि मुस्की ऐलैन्ह! 
हे जूड़ा बान्हि दिय? नहिं अवैया तैं की! बड़ सुन्दर बान्हि देब! 
मुस्की कनि बढ़लै। हुनको हौसला बढ़लन्हि। कहलखिन्ह, “अहिना बैसल रहू।  हिलब -डोलब नहि । हम यैह अवैछी। 
हाथ मे रंग -बिरंग के फूल तोड़ि ल’  ऐलाह। पैर त’ जेना हवा मे उधियाइन। आ मोन अकाश मे। 
हँ! मूरी कनि निचा झुकाउ। 
की छियै? 
किछु नहिं। जूड़ा मे फूल गांइथ दै छी। साक्षात मेनका -उर्वशी लागब! 
रूकू! हमरा हाथ धोव’ दिय! सभटा मेनका उर्वशी बाहर करै छी! 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी 09-07-2019

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