बकलेल कहीं के (मैथिली लघुकथा)

बकलेल कहीं के 
                           (लघु कथा) 

भुटवा यैह करिब दस वर्षक बालक अछि। भुटवा के माय -पिता बद्री बाबू के घर मे काज करै छलखिन ।पिछला साल कोन ने कोन बिमारी पसरलै जे भुटवा के माय-वाप दुनू के लील लेलकै। गरीब भुटवा अनाथ भय गेल।  बद्री बाबुक कनिञा के दया अएलैन्हि। भुटवा के अपने घर मे आनि लेलखिन्ह। 
                         बद्री बाबू रईस जमींदार।  ठाठ -बाठ मे रहय बला। बेचारा भुटवा हुनके सेवा टहल मे लागल रहैत छल। कखनों पाइन ला त कखनों पान सुपाड़ी। नहिं त’ भैर दिन पायर दबवैत रह। 
भुटवा त छल निम्न वर्ग मे जन्म लेने मुदा छल बड्ड ईमानदार आ स्वाभिमानी। बद्री बाबुक सेवा मे लगभग बरख दिन भ गेलै मुदा आई तक कोनो चीज लय मुँह नहिं खोललक। कतेक वेर छौंड़ा सभ मेला देख’ गेल। ईहो गेल मुदा खाली हाथ। किछु बिकाइयो लय आवै तैयो बेचारा टकटकी लगौने देखैत रहि जाय लेकिन बद्री बाबू सं दूओ पाई नहिं मंगलकन्हिं। एहन नहिं जे बद्री बाबू कठोर हृदय मनुख छलाह मुदा मलिकाना धाह त' छलन्हिंयें। हरदम सोचथि जे भुटवा मांगत त’ अवश्य देथिन्ह। भुटवा मंगतै तब ने! 
आई भिनसरे सं भुटवा जेना छटपटा रहल अछि। कखनो केबारी पकरि क’ त’ कखनो बद्री बाबू के कुर्सी  पकरि क’ ठाढ़ भ’ जाय। अंत मे बद्री बाबू पुछलखिन्ह, “ की बात छै भुटवा। तों एना बेचैन कियै छैं? “
मालिक हमरा दस टा रुपया दिय। कोनों तरहें भुटवा बाजल। आई बद्री बाबुक मनोकामना पूरा भेलन्हिं। उत्साहित होइत पुछलखिन्ह, “की करबिही दस रुपैया ल’क’? पहिल दिन बद्री बाबुक कनिञा मुंह खोललथि, “द दियौ ने! पहिल वेर त’ बेचारा मुंह खोललकै आ अहां वकील जकां जिरह करै छियै। 
                       भुटवा दस टाका लय लत्ते -पत्ते परायल। दू घंटाक बाद पुन: उपस्थित भेलइ। बद्री बाबूक जिज्ञासा  त’ चरम पर रहनि,  पुछलखिन्ह ,” कतय गेल रही भुटवा। चट गेलैं आ पट आवियो गेलैं? “
मालिक बुचनी माय के चिन्है छियै ने? के तोरे घरक बगल मे रहै छौ वैह ने? हं मालिक। ओकर हालत बड्ड खराब छै। आई  पांच -छ: दिन सं रटने छलै, “हम भात आ अल्लू के सन्ना  खायब। कटघरा बला दोकान सं चाउर आ अल्लू कीनि क द अएलियै। चाची भात आ अल्लू के सन्ना बना ओकरा खुआ देलकै। 
हम एतय चलि अएलहुं! 
बद्री बाबुक मुंह सं अनायास निकललन्हिं, “जो हंट बकलेल कहीं के “!
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 16-06-2019

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