बगिया खेलौं ने (मैथिली बीहनि कथा)
बगिया खेलौं ने
(मैथिली बीहनि कथा)
हेलो...! हेलो....! हां मम्मी....!
के....? नवनी...? की समाचार नवनी? बाप रे कतेक दिन पर फोन कयलैं?
मम्मी सुन न ! समाचार बड़ बढ़ियां। परसू भोर मे हम अबै छियौ। बम्बई … दू-तीन घंटा रहि फेर चलि जेबौ। हमर कम्पनी के एकटा आवश्यक मीटिंग छै। दिन भरि मीटिंग कय फेर सांझ मे वापस अमेरिका। दीपक नहिं औथुन। आभास के देखभाल करै लेल एतहि रहता।
मम्मी सुन न ! हमरा लय गुंर बला बगिया बना क’ रखिहैं। किछु खंदन किछु मोटरी बंधन। दीपको के बड्ड निक लगै छै। “ठीक छै। आ ने पहिने! “ माय कहलखिन।
दोसर रूम सं नवनीक भौजी रागिनी सबटा सुनै छलि। खुराफाती दिमाग हन हन चलय लगलै। बनै नै छै ननदि भाऊज मे। फोन पर फोन। सखी दर सखी। सबके परसू आठे बजे किट्टी पार्टी मे बजा लेलकै।
नवनी के माय बड़ जतन सं बहुत रास बगिया बना क’ राखि लेलैथ। एगारह बजे के करीब नवनी अएलै। कनि कालक गप्प सप्प के बाद माय के कहलकै, “ ला मम्मी जल्दी बगिया दे। भरि पेट खा लै छी। एकटा पैकेट मे सेहो निक जकां पैक कय क’ द’ दे। लेने जेबै।
नवनी के माय जखने बगिया लाबय किचेन मे गेली कि देखैत छैथ जे पूरा बर्तन खाली आ रागिनी के दोस्त सभ मजा ल’ ल’ क’ बगिया खा रहल छलै ।
किछु कहूं खा कय नवनी जाय लागल कि ओकर भौजिक आवाज सुनेलै, “ बगिया खेलौं ने !”
प्रमोद कुमार पांडिचेरी, 17-10-2019
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