नौवां साध्य पढ़ाओ (संसमरण हिन्दी)

नौवां साध्य पढाओ
                         (संस्मरण)

बात 1970 ई की है। अप्रिल का महीना था। घर के अन्दर थोड़ी थोड़ी ठंढ़ लगती थी। मेरे पिताजी पंडौल हाई स्कूल में शिक्षक के पद से इसी साल मार्च में रिटायर हो गये थे। मैं वहीं रहकर नौवीं में पढ़ता था। लेकिन पिताजी के रिटायर होते ही मुझे गांव के स्कूल में दाखिला करा दिया गया। पिताजी का नाम एक अच्छे शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध था और वह मेरे माथे पर चिपका आया। बहुत जल्द ही सभी शिक्षक मुझे प्यार देने लगे और बहुत अधिक अपेक्षा भी करने लगे। संयोग या दुर्योग से एक दिन अंग्रेजी के शिक्षक ने ग्रामर से प्रश्न पूछना शुरू किया और मैं जबाव देता गया। अव क्या था! एक मेधावी छात्र के रूप मे मेरा नाम जंगल के आग की तरह फैल गया।
एक दिन की बात है।एक शिक्षक अभी अभी बी. एस.सी पास कर आये थे। वह बीजगणित पढ़ा रहे थे ।पता नहीं उन्हें क्या सूझा कि उन्होंने मेरे हाथ मे चॉक पकराया और कहा कि जाओ और बोर्ड पर नौवां साध्य सिद्ध करो । मैं तो हक्का बक्का रह गया। जैसे पैर मन मन भर का भारी हो गये हों । उठता ही नहीं था। हाथ में चॉक पकरे किसी तरह बोर्ड तक तो पहुंच गया लेकिन जाड़े के महीने में भी कनपट्टी से पसीना चूने लगा। वैसे साध्य मुझे आता था!  पैर थर थर कांप रहे थे । हाथ से चॉक गिर गया।सभी लड़के ठठा कर हंस पड़े।मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। शिक्षक को लगा कि मुझे नहीं आता है । उन्होंने कहा,” कल पढ़ कर आना और तब बोर्ड पर सिद्ध करना” । मुझे लगा कि वास्तव में पढ़ाने से कठिन और कोई भी काम नहीं है ।घर आकर सोचने लगा कि क्यों न पढ़ाई ही छोड़ दूं। रात भर नींद नहीं आयी! सुबह स्कूल जाने का विचार नहीं था मगर पिताजी के डर से चला गया। स्कूल के पास ही बजरंगवली की एक छोटी सी मंदिर थी । उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया । देरी हो रही थी। चल दिया । लेकिन लगा कि हिम्मत आ रही है ।  कदम ठोस पड़ने लगे। क्लास में जाते ही फिर वही दृष्य । हाथ में चॉक थमा दिया गया । मैं भी एक सधे शिक्षक की भांति वोर्ड पर चित्र खींचा और समझाना शुरू किया । कुछ समय बाद एकाएक तालियों की गड़ड़ाहट सुनाई दी। मास्टर साहेब एक दो और शिक्षकों के साथ खड़े होकर ताली बजा रहे थे । उन तालियों की गड़गड़ाहट में छिपा आशिर्वाद ने मुझे आज एक सफल शिक्षक बना दिया !

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,11-02-2020

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