पागल नहिं भेलह (मैथिली बीहनि कथा)

पागल नहिं भेलह
                         (मैथिली बीहनि कथा)

गाड़िक बाट देखैत रही। लेट सं पहुंचब त' एच.ओ.डीक डांट खाय पड़त। फर्स्ट इयरक छात्र ! डर होइत रहै ! एतबहि मे हेडमास्टर साहेब भेट गेलाह। गोर लगलियैन्ह ! चट द' पुछि देलाह,” कालेज मे पढ़ै छह ?
की करबह पढ़ि क'? घंसैत घंसैत पैंट चिथड़ी भ' जेतह ! नौकड़ी नहिं भेटतह ! कतहु छोट छिन काज पकरि लैह ! नीक हेतह ! की करबह आगां पढ़ि क’ ! ताबे गाड़ी आवि गेलै!
तीन सालक बाद पुनः टिशने पर भेटलाह ! देखिते पुछि देलाह,” कत्त काज करै छह बाऊ !” हम कहलियन्हि,” बी.ए.आनर्स कैलहुं अछि ! अच्छा त' एम.ए सेहो कैये लैह ! एम.ए. पास कय भैंस चरेबह त' तोरो नाम हेतह आ तोहर पिता जे नामी मास्टर छथुन्ह, हुनको नाम हेतैन्ह ! कोनों तरहें जान छूटल ! धन्य नौ बजिया गाड़ी!
लगभग दस साल बित गेलै । अहि बिच हम पी.एच.डी कैलहुं आ लेक्चरर सेहो भय गेलहुं।सांझ मे दोस सभक संग बजार मे घुमैत रही। अचोके मे हुनका देख लेलियैन्ह।अवस्था भ' गेल रहैन्ह।मुदा दिमाग ओतबे चौकस । फेर वैह प्रश्न,” की करै छह?” कहलियैन्ह,” सेंट्रल यूनिवर्सिटी मे लेक्चरर छी “ चट द' कहलैथ,” पी.एच.डी नहिं करियह” “ पागल भ' जैबह”
हम कहलियन्हि,” हम त' पी. एच.डी कय लेलहुं”
ऐं पागल नहिं भेलह! भेले बुझ'!

डॉ. प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,25-01-2020

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