भेंट घांट (मैथिली बीहनि कथा) बीहनि कथा दिवस पर हमर टटका भेंट)
बसंत गद्दी पर आवि बैसल छलाह। हवा गदरैल रहै आ फूल सब मातल। लघुकथा आ बीहनि कथा के कनि मस्ती सुझलनि। टहल’ निकललिह। रस्ता एके से भेंट भ' गेलैन्ह। हाल समाचारक आदान प्रदानक बाद लघुकथा त' ठाढ़े रहलिह मुदा बीहनि ससरै के जोगार करय लगलिह! लघुकथा गप्प के भांपि कहलखिन,” हे बहिन अहां मुंह कियै नुकबै छी? अहां त' भाग्यवान छी। अहां केर मान्यतो भेट गेल।आव त' हंसू। “ हं से त' वेश ! मुदा अहां अपने-आप मे पूर्ण छी बहिन। अहां यात्रा आरंभ करै छी त' गंतव्य तक पहुंचवो करै छी। मुदा हम त'…!” ई कहि बीहनि कथा उदास भय गेली।
नहिं बहिन “ अहां हमरा सं श्रेष्ठ छी। अहां त' धानक बीहनि छी ! किसान उपारि क' रोपै लेल लय जाइत अछि। अहां हुनकर मुंह देखै छियनि...! केहेन हुलसल...! अहां संभावना सं भरल छी। फूलव, फलव आ अनेकानेक रूप लय लोक केर खुश करबनि। किसान अहां के जेना चाहय, सजौत, संवारत, आ सब तरहें उपयुक्त बनौत !” हम त' देखियौ छोटो छी, पैघो छी आ सबसं पैघ बात जे ठमकल छी ! लघुकथाक ई बात सुनि बीहनि मुस्की छोड़ैत आगू बढ़ि गेली ।
डॉ. प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,05-03-2020
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