फेकनी बुढ़िया (मैथिली बीहनि कथा)
फेकनी बुढ़िया
(मैथिली बीहनि कथा)
टोल के सब कोई हुनका यैह कहै छनि।“ फेकनी बुढ़िया “! घर द्वार बहारि सोहारि क' सबटा अनका घरक सोझा मे फेकनाई हुनकर आदति आ उद्देश्य बनि गेल छन्हिं ! बुझै छथिन जे लोक नहिं देखैया'। मुदा देखै छनि सब। ईर्षा द्वेष सं जरैत रहै छथिन्ह। खास क' अपन दियादनी सं।भिखमंगनी के बेटी राज करत ! हम जमिंदारक बेटी ! विधाता कपारे जरा देलथि ! भिखमंगनी बेटी के चारि चारि टा बेटा आ हमरा एक्केटा सेहो नांगड़ ! ढ़बसा माय (दियादनीक छोटका बेटा के सब ढ़बसा कहै छै) हमरा सोझा शान झाड़त ! देखा देखी ओकर ढ़बसी पुतहु सोहो केहेन उतान भय चलैया' आ बत्तीसी देखबैत रहैया' ! हमरो पुतहु के सिखा-पढ़ा कय नाश कैने जाइयै। सखी सखी अनघोल कयने रहैया' दुनू।
सांझ मे दुनू सखी बिचारलथि,” काल्हि हमर ललकी साड़ी अहां पहिरब आ अहांक हरियरकी साड़ी हम, नेंगराक कनिञां कहलकै । बेस ढ़बसी कहलकै ।"
ठहर तू ढ़बसी ! एहन सबक सिखेबौ ने जे सात पुरखा याद रखतौ ! फेकनी बुढ़िया आइ भोरे सं चुल्हा मे आगिक चिनगी के लहकबै मे लागल छथि। एक दू बेर पुतहु पुछलकनि त' किछ कहूं कहि टारि देलखिन। भिनसरक नौ बाजल रहै । जलखै कय दुनू सखी अपन अपन साड़ी के अदला बदली कय जखने घर स निकललै कि फेकनी बुढ़िया माटिक ढ़कना मे लहकैत चिनगी हरियरकी साड़ी वाली के देह पर फेक' लगली कि भक द' पुतहुक मुंह देखा गेलैन्ह। हाथ छिपलथि मुदा सबटा आगि अपने पैर पर खसि पड़लैन्ह ! नेंगड़ाक कनिञां एक्के बेर डिरिया उठलै । संयोग जे सासुक पैर बेसी नहिं झरक’लै !
सांझ मे फेकनी बुढ़िया मोटरी चोटरी बान्हि तैयार रहथि।। बेटा के कहलखिन्ह ,” बौआ ! हमर पापक गठरी भरि गेलौ । माघक मास छै । हमरा सिमरिया ल' चल । तोरा हाथक आगिक योग्यता हमर आब नहिं रहल । हमरा गंगाजी मे जिबते भंसिया दिहैं !
डॉ.प्रमोद कुमार
पांडिचेरी , 11-01-2020
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