एक चिराग क्या जलाया मैं ने(हिन्दी कविता)
एक चिराग क्या जलाया मैंने
सोचता था क्या औकात है इक
छोटे टिमटिमाते चिराग का
घनघोर अंधेरी रात है फिर
पवन भी दुश्मन बन खड़ा हुआ
जलाया क्या एक चिराग मैंने
पहले मेरा ही चेहरा रोशन हुआ
फिर मुझे लत लगी ऐसी कि
रोशनी ही रोशनी फैलाता गया
चिराग जला था दिल दिमाग में
था अन्दर प्रकाश मुख पर आभा
नत मस्तक हूं विराट चरणन में
जिसने मुझको ऐसी लत लगा दी
भूले भटके पथिक जो देखूं
ख़ुद दीया और खुद ही बाती
करूं न चिंता बस लौ लगा लूं
हो पथ प्रशस्त फिर दीया बाती
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 29-08-2019
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