मुर्खाहा (मैथिली बीहनि कथा)
मुर्खाहा
(मैथिली बीहनि कथा)
उमेर... यैह तेरह -चौदह के लगिच। पातर छितर देह। बड्ड मेहनतिया। भरि दिन हाथ मे कोदारि, खुरपी आ नहिं त’ कुरहैर रहबे करै। घरक आर्थिक स्थिति बड्ड कमजोर। दूदू टा गाय’के देखभाल,ओकरे जिम्मा।
ई सभ होइतो बड्ड आज्ञाकारी। डर भर त’ जेना जनिते नहिं होइ। आइ सांझे स’ परेशान छै। मुन्नी काकी के पेट मे बड्ड जोर दर्द करै छन्हि। ओझा आवि क’ झाड़ि गेल रहै। मुदा दर्द त’ ओहिना के ओहिना। मुर्खाहा (स्कूल कहियो कहियो जाइ तैं ओकर नाम मुर्खाहा) सांझे स’ मुन्नी काकी के ओसारा पर खम्हा पकरि क’ जे ठाढ़ भेलै से भेले छै। कखनो पानि आनि दै त’ कखनो पंखा हुंकै। अंत मे कहलकै, “ काकी गेरुआ के मोरि क’ पेट तर मे राखि लिय’ दर्द ठीक भय जायत। हमरो जहिया जहिया दर्द करैया ने त’ हमहूं यैह करै छियै। दर्द सं छटपटाइत मुन्नी काकी के मुँह पर कनि मस्कान पसरलैन्ह आ हाथ अनायासे मुर्खाहा के माथ पर चलि गेलै।
एतवा मे मुर्खाहा के माय चिकरलखिन्ह। “बजार जो। तोहर बाबू के लिट्टी आ चोखा खाइके मोन छैन्ह। ले इ दसटकही। पाव भरि सतुआ, सै ग्राम डालडा, आद, लहसून.... जल्दी सं ल’ आ। ले ई प्लास्टिक ओढ़ि ले। बड्ड जोर वर्षा भय रहल छै। अन्हरिया राति। बिकराल समय। झर झर झहरैत पानि। मुर्खाहा चलि देलक। पायर जतेक वेर पिछरै, मोन ओतबे मजगूत होइत गेलै। सोचि लेलकै। कनि कालक बाद आवि क’ सोझे मुन्नी काकिक अंगना गेलै। गोटी खुआ पानि पियौलकै।। रसे रसे मुन्नी काकिक दर्द कम भेले रहन्हि कि माय चिकरलखिन्ह, “ रौ मुर्खाहा.... तों बैसले छी ही? बजार नहिं गेलही? “
हं गै! बजार जा क’ आवियो गेलियै! कहलकै मुर्खाहा! “त’ ला समान सब कतय छौ। तोहर बाबू भुखे लहा लोट होइत छथुन्ह। “
“ कोन समान? हम त’ ओहि पाइ के गोटी किन क’ काकी के खुआ देलियै “! कहलकै मुर्खाहा। माय कपार पिट लेलखिन, “जो तों मुर्खाहा के मुर्खाहे रहि गेलैं! “
प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 29-11-2019
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