बिगड़ल जमाना (बिहनि कथाक दिवस पर विशेष)

 

भोल्वो बस। मद्रास सं पांडिचेरी अबैत रहै। सीट बिच मे भेटल रहै। ए सी बड्ड तेज। जाड़ लागै तैं दुबैक क’ बैसल रही। हमरा आगां किछु नवयुवक -नवयुवती सभ जोड़ लगौने बैसल छल। बात चितक क्रम मे बुझना  गेल जे ओ सभ बिहारे सं अछि। हिन्दी अंग्रेजी फेंट फेंट क’ बाजै। पछुलका सीट पर एगो समभ्रांत सन तमिल दम्पत्ति बैसल छलाह। 
तमिल महिला बजलिह, “देखियौ केहन निर्लज्ज सभ छै। एना त’ वरो-कनियां नहिं करैत हेतै।“ने कपड़ाक ठेकान आ ने.... “
हमर ध्यान अनायास ओमहर गेल त’ देखलहुं जे एगो जोड़ी गप्पो करैया’ आ चुम्मा.... “
एतबहि मे ओकर फोन घनघनेलै, “हां पापा! हम ठिक छी। अहां सभ कोना छी। “
हां हां! रिज़ल्ट...! खुब निक रहल! अहां चिंता नहिं करू! 
आएं! की कहलियै! ई पों पी के आवाज? 
हां सेमनार चलि रहल छै,ओही मे ई आवाज आवि रहल अछि। 
हं पापा! सेमिनार  रोड साइड मे चलि रहल छै। 
तैं ई पों पी सुनाइया’ अहां के। 
हं हं ! सेमिनार खतम होइते हम अहां के फोन करब। 
वस पांडिचेरी पहुंच गेल। कपार पर सं पसीना पोछैत हम उतरि गेलहुं

प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पॉंडिचेरी, 05-03-2019

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