ये कैसा रिश्ता है (हिन्दी कविता)
ये कैसा रिश्ता है
जब तुम रहते हो
अन्धकार नहीं रहता
अन्धकार रहता है
तो तुम नहीं रहते
ये कैसा रिश्ता है
तेरा और उसका!
हे प्रकाश के देवता!
अपना एहसास दिलाना ही है तो
कोई और रास्ता चुन लो
यह हाहाकार क्यों, अन्धकार क्यों
यह कैसा रिश्ता है तेरा
खुशी और गम से
पत्थर और मोम से
या फिर
आंशु और मुस्कान से
मृत्यु और प्राण से
अपमान और सम्मान से
ज्ञान और अज्ञान से
जमीन और आसमान से
आदि और अन्त से
पतझर और बसंत से
हे अनन्त!
समझा दो मुझे
कैसा रिश्ता है तेरा
मछली और जाल से!
प्रमोद कुमार उर्फ, " नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी
05-01-2019
4-05बजे शाम
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