हवा की मस्ती (हिन्दी कविता)

हवा की मस्ती 

कभी  बच्चे  का  कपोल  चूमू
फिर तरुणी के  गात सहलाऊं 
युवती  के आंचल  में  घुसकर 
उड़ा  उड़ा    उसको   शरमाउं

कभी  किसी माता के आंचल 
में  घुसकर  अमृत  पी   जाऊं 
कभी  किसी तपते श्रमिक के 
स्वेद  सुखे  शीतल  हो  जाऊं 

कभी  किसी  बादल बच्चे को 
बना     गुब्बारा    उपर   फेंकूं 
कभी  किसी  तरुवर की चोटी 
नोंच,  खींच  हंसूं, छिप  जाऊं

जहां  देखती हिरण  का छौना 
उसके  साथ  कुलांचे   भर  लूं 
फिर नील गगन  की सैर  करूं 
और खग राज से होड़  लगाऊं

शीतल शरद्  कभी  गर्म  अनल 
कभी गति मंद कभी वेग  प्रबल 
न  आदि   मेरा  न  अंत   ही  है 
उद्गम   कहां   गन्तव्य   कहां  है

हे बहन !  क्या  सुनाऊं    अपनी 
दिन  में   मैं ,  सोच   नहीं   पाती
निस्तब्ध  रात  की  काली स्याही 
डरा    डरा   कर    हमें   सताती

प्रमोद कुमार 
पांडिचेरी 30-11-2019

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