सुरुजो के आव जार लगै छनि (मैथिली कविता)
सुरुजो के आव जाड़ लगै छनि
सुरुजो के आव जाड़ लगै छनि
ठिठुरैत- कंपैत राइत कटै छनि
भरि राइत पेट करै छनि गड़- गुड़
फोम सन कम्मल नहिं जाड़ हरै छनि
बेटा बसलैनि जा अमरीका
इहो राइत क' ओत्तहि जाइ छथि
चाउमिन खाक' कौफी पीवि क'
पहिर पैजामा सूइत रहै छथि
सीड़क के बड़ याद अबै छनि
सुतले छोरि पराइत अबै छथि
जा धरि पहुंचथि अप्पन सीमा
आधा पहर बीत जाइत छनि
मायावी कोहरा आ' ओस
सर्द हवा छनि हिनके दोस
सभक देह सं प्राण खिंचि क'
नृत्य करै ताण्डव बड़ जोर
चारि सोहारी घी सं चोपड़ल
खाइ छला है दम अल्लू संग
महिंसक दूध छाल्हि बड़ मोटगर
ताहि पर भेटनि ' हुनकर' परसल
तैं छला है मोटगर- सोंटगर
लाले- लाल भाल छलैन्हैं
आभा सं चमकैत मुख- मंडल
देखू आव पिल- पिलैल छनि
सूरुजो के आव जाड़ लगै छनि।
प्रमोद कुमार उर्फ,"नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी
दि.02-01-2019
संध्या-6-45
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