कत्ते बाज' लय। ( मैथिली बीहनि कथा)
कत्ते बाज’लै
माघक मास! शितलहरी चैल रहल छलै। दिनों क’ लोक सभ दलानक भीतर अंगैठी पजारने रहै छलै। राइतक त' पुछु नहिं। बच्चा आ जुआन -जहान त’ कोनों तरहें निमाहि रहल छल, बुढ़ पुरान के कष्टक ओर नहि ।
धीरू बाबू सभ सं पैघ पढ़ाई क’ रहल छलाह। हुनका एकांतक खगता रहैन्हि, तैं ओ दलान के कोना मे संदुक पर सुतैथ, बैसैथ या एना कहु जे दिन भरि ओत्तहि पेटकुनियां देने किछ कहुं लिखैत रहैत छलाह।
गुलाब कक्काक नौकड़ी छुटना बर्षों भ’ गेल रहनि। एगो दोकान मे मुंशी रहथि। एगो पूत सेहो निकम्मा। फांका चलैन्ह। कै कै सांझ निराधार !सीड़क आ कम्मल के की कहल जाय, एकटा खेनड़ी ओढ़ि जार सं लड़ैथ! सत्तैर-पचहत्तैरक अवस्था, देह मे गुद्दाक निशान नहिं। जार कोना कैटतैन्ह ! धीरू बाबुक सीड़क मे घोंसिया जाथि। कोनो हर्ज नहिं।
मुदा भुखल पेट निन्न कत्त! राइत भरि अहि करोट सं ओहि करोट बदलैत भोर होइन्ह। नीन नहिं होइन्ह त ‘रहि रहि धीरु बाबू सं समय पुछथिन्ह। आव कत्ते बाजल , आव कत्ते बाजल! अजुको राइत पुछलखिन, “कत्ते बाजल”
धीरू बाबू -एक बाजलै।
कनियें काल बाद, “आव कत्ते बाजल?
“अढ़ाई!”
गुलाब कक्का देखैत रहैत छलाह, जेखने धीरू बाबू करोट बदलताह कि पुछबनि। धीरुओ बाबू गब्दी मारि लैथ।
की करताह! करोट त’बदलैये परतन्हि।
गुलाब कक्का ताके मे रहथि। फेरो पुछलखिन्ह, “कत्ते बाजलै धीरू“
ओह! सुतु ने गुलाब कक्का!
अहां के त’ निन नहिंयें होइयै, हमरो निन खराब करै छी!
अखन बड्ड राइत छै! साढ़े तीने बजलैया। सुइत रहू।
हे भगवान लोक बूढ़ कियै भ’ जाइछै! मोने मोन धीरू बाबू बजलाह!
भोर मे सभ जलखै क दलानक ओसारा पर बैसल गुलाबे कक्काक नीनक खोद-बिन मे लागल छल कि एतबे मे गुलाब कक्का आबि गेलखिन। धीरू बाबू के की फुरेलैन्ह से पता नहिं! बजलाह, “गुलाब कक्का! एकटा काज करू! ई घड़ी अहीं राखू! जखन मोन हैत,त’ समय देख लेब! “
गुलाब कक्का चुप्पे ओत’ सं ससैर गेला ।एक आंखिक कोन सं नोरक बूंद खस’लगलैन्ह। चट द’झंपलैथ।
राइत मे कत्त सुतलाह,से केओ नहिं बुझलक। भोरे हल्ला भेलै गुलाब कक्का के पाला मारि देलकैन, पाला मारि देलकैन! तेकर बाद .......!!!!
लेखक-प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, दी. 28-01-2019,pramod_drpk@yahoo.co.in
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