मुदित मन (मैथिली कविता)

मुदित मन 

(मेरी मैथिली रचना का हिन्दी रुपान्तर) 

आज मैं ने देखा प्रकृति को
खेती करते प्रत्यक्ष 
कहीं बहा कर झील और झरना 
कहीं बहा कर नाल नदी 
है उगायी कहीं पहाड़ पहाड़ी 
तो कहीं उगायी है चीड़ का वन
और घास का जंगल 
कहीं लहलहाते खेत 
कुछ बादल काले काले 
तो फिर कुछ दूध से उजले 
लुकते छिपते नटखट और चंचल 
कभी चूमते शीष तरु वर के, पर्वत के
क्षण में धरती के चरण पखारें
स्वच्छ पवन, उमंग अनंत
चूम धरा चरण, बादल को ठेले 
तो खेले तत्क्षण तरु वर के संग 
कहीं हिरण ताकें स्तम्भित
चिड़ी चिड़ा मधुर तान सुनाबें
कण -कण निर्मल 
जन -मन कोमल 
ऐसी प्रकृति के गोद में  
बैठा आज मैं 
तिरोहित है मन 
संतति के संग! 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 22-08-2019

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