तरुणी सी उषा (हिन्दी कविता)
तरुणी सी उषा
तरुणी उषा निकली भोर में
नया उमंग नयी थी ऊर्जा
अंगड़ाई लेता अंग अंग
हाथ पसारे दौडी ऐसे
भर लेगी क्षितिज को बाहों में।
कुलांचे मारता हिरण का छौना
बादल का बच्चा उछलता कूदता
अभी अभी मां के आंचल से
बाहर निकला हवा का बच्चा
चोटी खींचता उषा तरूणी के।
तरुण है बादल उषा तरूणी है
तरूण ही छौना है हिरणी के
क्षितिज के आंचल में छिपकर
तरुण प्रभाकर छिप छिप देखे
अनुपम खेल इस प्रकृति के।
भागो समय खलल न डालो
युव युवती में हमें न ढ़ालो
भरूं कुलांचें गगन को चूमूं
तरुणी हूं तरूणाई जी लूं
तुम्हें यदि ईर्षा होती है तो
चक्के को उल्टा घुमा लो।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी
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