शब्द: निस्तब्ध (हिन्दी कविता)



एक शब्द निकला था 
कांधे पर कराहने का बोझ लिये
थरथराते टांग 
मुंद -मुंद जाती आंखें
घिसट रहा था 
लकड़ी के सहारे 
पहुंच ही गया 
भूपति के शहर में 
घनघोर घटा घिर आये 
ढ़न ढनाक ढ़न गर्जना 
कौंधता आशा का प्रकाश 
हिम राज समान घोषणा 
इतना बरसेगा आज 
मरुभूमि में भी तृण पनपेगा 
काश! पता होता 
पीछे तूफां छुपा लाया है
उत्सव खत्म हुआ 
उड़ गया सब कुछ 
टूट गयी लकड़ी 
शब्द :निस्तब्ध! 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 26-04-2019

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