चान लुटाबय चांदनी (मैथिली कविता)

चान लुटाबय चांदनी 

चान आइ अछि साजल संवरल 
सोलहो कला सं पूरित छै 
लुटा रहल अछि ज्योत्सना 
सब लूटै लै दौडै छै। 
क्यो दौड़लै छिट्टा ल’ क'
क्यो बोरा मे कसै छै 
एक मूर्ख हमरा सन देखू 
आंजुर आगू कयने छी। 
सेहो कौमुदी छिटकि क’भागलि
हाथ हमरा किछुओ नहिं लागल 
बैसल कपार पीटै छी अपन 
चन्द्रिका बैसल अछि आनक घर मे
हम ईर्षा मे जरै मरै छी 
हे चान अहां कियै रूसल छी
हमरो भाग जगा दियौ ने। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 06-09-2019

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