मंजिल दूर है (हिन्दी कविता)
मंजिल दूर है
आज फिर से पटका है
उसने मुझे
काफी सीढ़ियां चढ़ गया था
मंजिल दिख रहा था
ठेल कर गिरा दिया है
जबतक और न धकेलूं
सांस लेता रह
कह गया है
कलयुग जा रहा है
मैं चिल्लाता रहा
पूछता रहा
अव कौन युग आयगा
मैं ने सभी युगों में वही देखा
जो आज देख रहा हूं
अब इसमें क्या अलग होगा
बताता जा
रे मूर्ख !
सब कुछ होगा
नदियां, पहाड़, समुद्र
पाप,पुण्य, रोग, दुख
और सुख भी !
ओह! तब क्यों गिराते हो
फिर से सीढ़ियां चढ़ेगा न तूं
एक... दो... तीन …
बड़ा मजा आयगा
और वह भाग गया ….!!!
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी 3-5-2020
Comments
Post a Comment