आगि रौ आगि (मैथिली कविता)

आगि रौ आगि

आगि रौ आगि
     कत्त गेलैं भागि
आवि  जो फेरो
     हाथ  कठुआइछ

 पूसक मास  छै
     सौंसे  कुहेश छै
पूरवा  बहै  छै
          देह कंपबै छै।

गैसक छै चुल्हा
     बड़ मुंह फुल्ला
अपने लय गरम
     अपने लय ठंढ़ा

गोंइठा आ करसी
     खुरही  आ  चेरा
जरा दे रौ बौआ
     वैह आब सहारा

सिरको फेल भेल
     कम्बलो छै बेकार
सुइटर आ चद्दैर
     भगबै नहिं जार

तईं रौ हे बाउ
     आगि तूं पजार
चट  द   भगतै
     बड़का  ई  जार।

प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,17-12-2019

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