अनबुझ बंधन (मैथिली कविता)
अनबूझ बंधन
ये कैसा बंधन था तेरा, मेरा
मैं रोया, तुम हंसी
तेरे साथ ही
उठा, बैठा, खाया और सोया भी
मेला देखने गयी तुम
मैं भी चला, पीछे पीछे
पैर दुखा तेरा और
दवा दिया मेरा
क्यों न समझ पाया मैं
यह अनूठा बंधन
तेरा और मेरा!
कभी मैं दिनभर भूखा रहा
तुम भी नहीं खायी
कैसे जान जाती थी तुम!
कभी आधी रात को आता था मैं
तुम बराम्दे के कोने मे
अकेले मिट्टी का दिया जलाकर
बैठी राह देखती थी
डर भी नहीं लगा तुम्हें!
याद है तुम्हें
तुम ही परोसती थी
तब मैं खाता था
नहीं तो नहीं
मैं बहुत जिद्दी जो हो गया था
तेरे प्यार में!
रोटी चाहे सूखी हो या वासी
मोम सी पिघलती थी
मेरे मुँह में, पेट में!
याद है,
मैं बीमार पडा
कोई नहीं था, पैसा भी नहीं
तुमने उन्हें बुलाया
उन्होंने पढकर राख दिया
तेरी विवशता देख
मैं ने खा लिया और ठीक भी हो गया
फिर तुम हंसी, मैं भी हंसा ,
क्यों
न तुम जानी
न मैं जान पाया।
फिर तुम रोयी
मैं भी रोया, क्यों
न तुम जान पायी
न मैं ही जान पाया।
देखो अब क्या हो गया है
मक्खन मलाई खाता हूँ
कंकड-पत्थर सा गडता है!
कहाँ गयी तुम!
सपने में ही आओ ना
वही सूखी-बासीरोटी
परोस, खिलाओ ना!
फिर से तुम हंसना
मैं भी हंसुंगा
तुम बहुत दूर से आओगी
इसवार तुम्हारा पैर मैं दबाऊँगा!
फिर तुम रोना
मैं भी रोऊंगा
क्यों
न तुम समझना
और न मैं समझुंगा
माँ... मेरी मां.......!!
प्रमोद कुमार उर्फ "नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी
दी. 18-01-2019
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