मोटर साइकिल (बीहनि कथा)
ऐं रौ छौंड़ा! भुटवा?? की रौ ?केमहर सुरूज उगलै आई रौ?
केकर मोटर साइकिल उठा अनलिही रौ!
मोकना कें त’ विसवासे नहिं भेलै! काइल्ह तक ई छौंड़ा महींस चरबै छल आ आइ मोटर साइकिल!
हो न हो केकरो वला मांगि अनने हैत। खाई लै लाई ने आ... कथीदन लै बिलाई! मोकना मोने मोन
बुदबुदैल।
केकर ल ‘अनलिही रौ?
हमरे छियै हौ, मोकना भैया।
आएं रौ! कटै छैं घिसियौट आ किनै छैं मोटरसाइकिल! बड नीक। क’’’ केना किनलिही से कनि बता न हमरा।
नैं बुझलहक? महींस बेच देलियै।
की!!!!! महींस बेच देलही। नहिं नहिं ई काज नीक नईं भेलौ।
अच्छा बता,” भैंस बेच क’ मोटरसाइकिल भ’गेलौ”?
मोटरसाइकिल! देखहक ने! ई फोनो किन लेलियै!
वाह तों त’ बड़ होशियार निकललैं रौ भुटवा।
हे सुन न! केकरो कहियै नहिं। “एकटा हमरो किना दे न।“
तों कत’ स किनबहक! तोरा ने खेत पथार छ आने माले जाल!
हे रौ! बुरबक कहीं के! एक कट्ठा घरारी छै ने वैह बेच देबै।
बाप रे! तों की बजै छ हौ! कक्का त' सोगे मरि जेथुन्ह!
ओनाहिंयों आव ऊ लटकले छथि। कत्ते दिन जीता।
चल हमहूं एकटा खरीदिये ली। गदहा जनम त’ तरि जैत।
लेखक—प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ ।पॉंडिचेरी. 02-02-2019.pramod_drpk@yahoo.co.in
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