छुई मुई सी जिंदगी (हिन्दी कविता)

छुईमुई सी जिंदगी 

कैसी थी जिन्दगी 
छोटी सी, तितली सी 
फर फर उड़ती 
फूलों से बातें करती 
छुईमुई की पत्तों सी 
लजाती, सकुचाती 
ठंढ़ी हवा आती 
पुचकार जाती 
तीनों जहां की 
खुशियां पा जाती
यह ज़िन्दगी! 
अरमानों ने दबा रखा है 
डैने बड़े हुए तो
आसमान अनंत हुआ है
कहां गयी वो तितली 
कहां है वह छुई मुई का पत्ता 
रूठती है अभी भी 
यह नादान जिन्दगी 
मनाने कोई नहीं आता 
हवा तो खुद जल रही है
हरे जंगलों में 
मुरझायी यह ज़िन्दगी। 

प्रमोद कुमार 
नई दिल्ली, 11-06-2019

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