दू पाथर
दू टा पाथर
अगर जित्त
नदी बिच ठाढ़ छल
अडिग जेना पहाड़
घमंडो ओतबहि
बड्ड नेहोरा कैलकै जल धार
कनि रस्ता दिय' ने
हमरा जाइ के अछि
हुंह! कतय जाइछी
चौबिसो घंटा हर हर, कल कल
अहां की बुझबै!
हम कतेको के चरण धोवै छी
प्यास बुझवै छी
अन्नदाता के मुख चमकवै छी
अर्ध्य के अराध्य तक पहुंचबै छी
सम्पूर्ण संस्कृति हमरे नाम अछि
अति आनंदित भय विशाल मे बिला जाइ छी
फेर केओ लबैया आ हम
लागि जाइत छी
हमर आनंदक अनुभूति अहां के कोना होयत
अहां त' अडिग छी
पाथर छी!
हमर उद्धारक बाट देखाउ ने
अडिगता हमरा अर्थहीन कय देलक
देखू !अहूं हमरा संगें दौड़ू
अहां के पैघ होयवाक अहं अछि
छोट बनू
आ पाथर चलि पड़लाह!
टकरेलाह ! चूड़ेलाह !बुकनी भय गेलाह!
देखलाह जे विशाल त'
हाथ पसारने स्वागत मे ठाढ़ छथि
पाथर के परम गति प्राप्त भेलैन्ह!
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,7-7-20
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