कोरोना काल में हमारा साहित्यिक सफर

                              
                                          डॉ.प्रमोद कुमार
                                          अध्यक्ष, अर्थशास्त्र विभाग, टैगोर गवर्नमेंट आर्टस एण्ड साईंस कालेज
                                          पांडिचेरी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, पांडिचेरी।

वेवश कहां होता है मन! यह बात कुछ देर से दिमाग को समझ आयी। २४ मार्च को कालेज से यही सोचकर आया, “ चलो कुछ दिनों की तो बात है! मजे में कटेंगे। पसंद का खाना, दोपहर में सोना कविता कहानी लिखना! आह ! मौज ही मौज होगा! मन में लड्डू फूट रहे थे । २५ मार्च के सुबह ही मैथिली में एक रोमांटिक कविता लिख डाली, शीर्षक था, “ कुसुमक कांट” मतलब फूल के कांटे। प्रथम चार पंक्तियां हिन्दी में अनुवाद कर उधृत करना चाहूंगा,
 “उपवन में फूल का रंग देख, मन थोड़ा फिसलने लगा।
जैसे ही थोड़ा निकट गया  ,कांटा बदन में चुभने लगा।“
अभी मन प्रेम रस में गोंते लगा ही रहा था कि कोरोना का भय पिछले रास्ते दिल में घुस गया और पुष्प का प्रश्न आंखों में समाकर पूछने लगा, “क्या मैं वही पुष्प हूं”? डाली पर खिल कर पवन के झोंके में झूल रही हूं, रंग चटख है फिर पूछता क्यों नहीं कोई? न कोई प्रेमी आता है, न ही पुजारी ! क्या हुआ लोगों को ? ये प्रश्न मेरी एक दूसरी मैथिली कविता, “ क्या मैं वही पुष्प हूं” में समाहित होकर मेरे सामने आये। क्या उत्तर देता। मन ने खीझ कर कहा,” जा कोरोना से पूछ”! फूल के इस प्रश्न ने स्वभाव से आशावान व्यक्ति को यह लिखने पर मजबूर किया,
 “ एक तिनका , दूसरा तिनका
फिर उसपर से एक और तिनका
पसीना से लथपथ,फिर एक घोंसला
दो अंडे,फिर आशा ही आशा”
निराश मन में आशा कि किरण क्या फूटी कि मन ठिठोली पर उतर आया और हिन्दी में एक कविता लिख डाली—खुराक (३-४-२०२०)
हाथी जैसा डील डौल है,ऊंटों जैसी चाल
फटे बांस सी बोली मेरी,भालू जैसे बाल ।
डायटिंग पर चल रहा आजकल,खुराक कर दिया आधा
दर्जन भर केला किलो भर सेव,उतना ही अंडा लिटर भर दूध
रोज सुबह लेता हूं ठूस।

लंच में लेता रोटी भात,चिकेन फ्राइ और मछली साथ
दाल मक्खनी गोभी फ्राइ,डेसर्ट के लिए देखूं राह
बस इतनी सी मेरी खुराक ,डिनर में लेता रोटी दस
बड़ा कटोरा अरहर दाल,बहने देता घी की धार
किलो भर शब्जी उतना ही दूध,जा पकरता अपनी खाट
बस इतनी सी मेरी खुराक।

इस रचना के बाद मन इतना हल्का और आशा से भर गया कि अगले ही सुबह चार पंक्तियां यों लिख डाली-(४-४-२०)
“ काले बादल वर्षा लायें
झूम झूम फसल लहरायें
कोरोना अपनी मौत मरेगा
यदि कुछ दिन घर बितायें।“
अभी आशा के नाव पर चढ़ नौका विहार का मजा ले ही रहा था कि खबर आयी कि किसी एक जमात के लोग सरकार के साथ न चलकर पूरे देश में बहसियाना रुप से कोरोना फैला रहे हैं। मन तिक्त हो गया और प्रश्न करने लगा महत्त्वपूर्ण क्या – “ मनुष्य या उसका धर्म?” और अनायास ही कुछ पंक्तियां लिख गया।(५-४-२०)
हमने आशा के दीप जलाये, तुम्हें अंधेरा पसंद है तो हम क्या करें
हमने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, तुम्हें दुश्मनी पसंद है तो हम क्या करें
हमने तुम्हें पतवार थमाया,तुम्हें डूबना पसंद है तो हम क्या करें
हमने मंजिल के राह दिखाये, तुम्हें भटकना पसंद है तो हम क्या करें
पूरा देश एक साथ है, तुम्हें तनहा पसंद है तो हम क्या करें
जीते हैं, जीतेंगे देखना तुम, तुम्हें हारना पसंद है तो हम क्या करें
हम दौड़ेंगे, उर्जा भरी है टांगों में, तुम्हें लड़खड़ाना पसंद है तो हम क्या करें।
तिक्तता भरे माहौल में मन भी बेचैन हो गया। उसे लगा कि इस शरीर के साथ उसका निभना कठिन हो गया है। वह चल पड़ा नया आशियाना खोजने और मेरे मस्तिष्क से शब्दों के प्रवाह ऐसे फूट चले-(११-४-२०) 
दिल ने कहा मन से
मैं ठीक हूं , जिस घर में हूं
वहीं ठीक हूं ।
बाहर नहीं जाऊंगा, हवा गन्दी है
बैठ जाऊंगा
तुझे जाना है तो जा, और मन चल पड़ा
दूसरा घर सुरक्षित कर लूं, कौन जाने !
बसंत आकर जल्दी चला गया था
एक बूढ़ा पेड़, पत्र विहीन
आश लिये अभी भी खड़ा था
अव क्यों खड़ा है ?
गिरने से पहले, दूसरा घर देख ले !
मेरे साथ हो ले!
पेड़ ने कहा
मैं ने जड़ को कस कर पकड़ा है
सूखी पपड़ी के नीचे जमीन अभी गीली है
कोपलें फूटेंगी
कुछ देरी हुई है, पर निराश नहीं हूं
काश ! मैं भी तेरे जैसा दृढ़ होता
मन वापस चल पड़ा!
मन को उसकी गलती महसूस हुई। और वह हल्का हो गया । निराशा गयी तो आशा का आना तो निश्चित था । और वह आयी और अम्बर को छूने की बात करने लगी। स्वतः ही कविता फूट पड़ी।
बहुत बड़ा तुम करना प्रभु मुझको
हाथ बढ़ाकर अम्बर छूऊं
ज्ञान की वर्षा करूं वहां से
सम्पूर्ण धरा को सिंचित कर दूं
स्निग्ध धरा पर कोपल फूटें
हरितिमा की चादर फैले
खग मृग खेलें भय विहीन हो
बहे प्रेम की सरिता कल कल
मानवता की झरना झर झर
पर एक उपकार करना प्रभु मेरे
इतना भी बड़ा न बनाना मुझको
चौराहे पर मूर्ति बन बैठूं और
कौवे वीट करें सिर बैठे!
नहीं बनाना डाक टिकट तुम
रोज रोज ठप्पा खा खा कर
विकृत मुंह ले बाहर निकलूं
इतना ही दया करना प्रभु मुझ पर
टोकरियों में नाम सजाना
पुस्तक बन जाये चिर गृह मेरा
पाठक मुख देखूं और मुस्काउं !
मन में आशा के दीप जल रहे थे लेकिन इस कोरोना को वह मंजूर कहां। सुबह सुबह टी वी में समाचार देख आशा के पहाड़ धराशायी हो खाई में बदल गये। मन रोने लगा। भरोसा जाता रहा कि अव रंगीनियां कहां और कैसे दिखेंगी और इन पंक्तियों में निकल पिघल कर गालों पर बहने लगा ।
रोती हैं हड़कें,और रोती हैं संकरी गलियां, और दुकानों की सीढ़ियां
रेलिंग खड़ा उदास है, निराश उसके खम्भे, आती थी कितनी तितलियां
उनके कोमल हाथ छिछलते थे मेरे देह पर,काश! वह सिहरण लौट आतीं
वे देखती थीं कभी साड़ी, कभी सलवार सूट,
दुकानदार तो बेचने में बैठ मग्न, मैं तो कुछ और ही देखता था
कभी उनके सुर्ख होंठ, या कपोल के गड्ढ़े, घंटों साड़ियों को उलटना पलटना
दुकान के शीशे का तो और भी बुरा हाल है, गुमान में रहता था हरदम
रोज ही नजरों से गुजड़ती थीं, कितनी सुन्दर छवियां
जानता कि ऐसा होगा, तो घर ही क्यों न बना लेता दिल में, और बिठा लेता उन्हें
न जाने अव वो दिन कब आएंगे, जल विन मछली सा छटपटा रहा है
लिपिस्टिक का बक्सा और उसमें पड़ी रंगीली स्टिक
लगाती थीं वो और रोयें खड़े होते थे मेरे, क्या वो दिन आएंगे फिर से
पूछती हैं सूनी सड़कें और रोती हुई गलियां,
जव रौनक नहीं कहीं पर, फिर क्या है उनका जीना !
                         कहावत है ”  हारी बिल्ली खंभा नोचे “ । कवि जानता है कि वह स्थिति नहीं बदल सकता तो अपनी खीझ हवा पर उतारता है, और कह उठता है-

घर में बैठ हवा

ऐ हवा तूं चली कहां
घर में बैठ,बाहर दूषित जहां
जाने कहां कहां तूं जाती है
किस किससे मिल आती है
कैसे कैसे दोस्त हैं तेरे
पहले धूआं और गर्द ही लाती थी
अव तो कीटाणु भी लाती हो
फिर नाक में घुस,शिराओं तक पहुंच जाती हो
कहती हो,सांसें चलाने आती हूं
मैं तो समझूं,घूम फिर कर
धड़कनें बढ़ाने आती हो
मेरी मानो,मेरी ही तरह
घर में ही रहो
                मन को लगने लगा कि हवा या पानी अपने आप तो नहीं बदलते। मनुष्य स्वयं ही इसका कारण है। प्रकृति के अंधाधुंध दोहन की होड़ सी लगी है। चारों तरफ प्राकृतिक असंतुलन ही दिखता है। अव प्रकृति ने ठान लिया है मनुष्य को सबक सिखायेगी । सिखाती भी रही है। कहते हैं जल प्रलय के बाद ही द्वापर खत्म हो कलियुग का आरंभ हुआ था। कहीं फिर से किसी नये युग की संधान तो नहीं हो रही। 
शंकालु मन लिख देता है
      मंजिल दूर है

आज फिर से पटका है,उसने मुझे
काफी सीढ़ियां चढ़ गया था
मंजिल दिख रहा था
ठेल कर गिरा दिया है
जबतक और न धकेलूं ,सांस लेता रह 
कह गया है कलियुग जा रहा है
मैं चिल्लाता रहा,पूछता रहा
अव कौन युग आएगा
मैं ने सभी युगों में वही देखा
जो आज देख रहा हूं
अब इसमें क्या अलग होगा,बताता जा
रे मूर्ख ! सब कुछ होगा
नदियां, पहाड़, समुद्र
पाप, पुण्य, रोग, दुख
और सुख भी !
ओह! तब क्यों गिराते हो
फिर से सीढ़ियां चढ़ेगा न तूं
एक... दो... तीन …
बड़ा मजा आएगा
और वह भाग गया ….!!!

किसी ने सच कहा है, “ दुख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोई
                                          जो सुख में सुमिरन करे , दुख  काहे को होए”
पापी मन अव क्या करे ! प्रभु सुमिरन को उद्धत हुआ और एक ऐसा गीत लिख गया जिसे वह रोज गाता है। 
“सखी रे चल ने यमुना तीर
यमुना तीरे गाछ कदम्ब छै
पाते पाते फूल लटकल छै
भंवरा गावै गीत
                          सखी रे चल ने यमुना तीर!

चूंकि यह मैथिली में लिखी गई है, मैं पूरा उधृत नहीं कर रहा हूं। लेकिन मेरे मन में प्रेम और भक्ति की ऐसी ज्योति जगी कि पुनः मैं ने राधा कृष्ण संवाद लिख डाली। कलियुग में जीवन के कलुषित नाव को यदि किसी प्रेम सम्बन्ध में पार लगाने की क्षमता है तो नि: संदेह वह राधा-कृष्ण ही हैं। राधा-कृष्ण रूपी प्रेम और भक्ति की नाव पर सवार व्यक्ति के लिए क्या  मझ धार और क्या पतवार ! इसी प्रेम- भक्ति के नाव पर सवार मन ने राधा कृष्ण संवाद के रूप में रचना करवा डाली।
राधा- मोहन संवाद
     (गीत)

तु   राधा   घनश्याम  मैं  तेरा
तु  नाचो  मैं  मुरली   बजाऊं
मैं  माखन  तु  है  मिश्री मेरी
तूं    नदिया   मैं   धारा   तेरा
        तूं राधा घनश्याम मैं तेरा ….!
जमुना  तट  पर   झूला  टांगूं
तूं   झूलो   मैं    डोरी   खींचूं
हौले – हौले    पेंग     बढ़ेगी
धरा  गगन   मिल  जायेंगी  रे
       तूं राधा घनश्याम मैं तेरा……..!

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मैं  मूरख   कुछ  भी  न  जानूं
तूं  माधव   जगत  के   स्वामी
बन  मयूर  नाचो   मेरे  मन में
हर  क्षण नयन निहारे तुझक
     मैं राधा घनश्याम तूं मेरे………..!
मन  की  डोर  बंधी  है  तुमसे
मैं जाऊं वहीं तुम जहां जाओ
जग  चाहे  कुछ  भी कर ले रे
रंगी  श्याम   रंग  न  धुल पाये
       मैं राधा घनश्याम तूं मेरे ………!

अव मुझे लगा कि मेरी भक्ति में इतनी शक्ति नहीं कि उन पावन प्रेमियों तक पहुंच सके तो फिर सहजता से उपलब्ध माध्यम हवा को ही फिर चुना अपना संवाद उन तक पहुंचाने।

ऐ हवा कुछ बोल न
ऐ हवा तुम कुछ  बोल न
     हौले  हौले  ही  डोल  न
देख  पत्ते  निर्जीव टंगे हैं
     जीवन उनमें फिर घोल न !
             ऐ हवा कुछ बोल न …!

पेड़ पर बैठे खग के बच्चे
       सड़क किनारे छोटे पिल्ले
गली में घूमते वन के जीव
        पूछ रहे मानव कहां गोल !
                ऐ हवा कुछ बोल न …!

बादल की बूंदें पूछ रही हैं
      बच्चे क्यों नहीं कूद रहे हैं
बड़े बूढ़ों की डांट बन्द है
      छाते सब क्यों हो गये गोल !
              ऐ हवा कुछ बोल न …!

मेरी तो उतनी पहुंच नहीं है
       तूं तो जाती अम्बर के आगे
जा विधाता से  कह  के आ
        बंद दरवाजे  फिर  खोल ना !
                   ऐ हवा कुछ बोल न….!
जब वर्तमान आफत में फंसी हो तो भविष्य की कौन कहे। अंधकार ही अंधकार ! ऐसे में मन को भूत में गोंते लगाने से कौन रोक सकता है। और वही हुआ। मैंने अपने रिसर्च के क्रम में दिल्ली यात्रा का संस्मरण लिख डाला। काफी घटना पूर्ण और सबक सिखाने वाला समय था। संतोष नाम का एक नवयुवक मेरी- उसकी मातृ भाषा एक होने के कारण मेरा मददगार बना।
अव एकाएक मन में एक बात कौंधी। मैं क्या हूं। पृथ्वी के अनंत सृजन का एक विंदु मात्र। वर्तमान स्थिति में जब मुझे लोगों की मृत्यु और संघर्ष से इतना कष्ट हो रहा है तो उस मां की क्या दशा होगी जो सबों की जननी है और सभी बंध्या स्त्रियों में एकमात्र सजला सुफला है! मन दर्द से छटपटा उठा और धरती के मुख से ही कहलवा दिया---
मेरी प्यास बुझाता चल
मधुर मधुर धुन गाता चल
मेरी प्यास बुझाता चल
नदी झील झरनों में खोजूं
खोजूं झाड़ झंखारों के नीचे
बहते बयार के अंदर खोजूं
या तुहिन के चट्टानों में
कहां प्राण छिपा रखी है 
पूछूं जलते अंगारों से
क्यों मेरे प्राणों के दुश्मन
सभी बन बैठे बाजारों में
मैं धरा धू धू जलती हूं
कभी कीट के प्रकोप से
या फिर विषैले वाणों से
एक मैं दूजा नहीं कोई
जीवन धारणी गंग व्योम में
अव हे अदृष्य! हे विशाल!
आंखें खोल, ले संभाल
जीवन बन बरस जा फिर से
ढ़ोल पीट फिर गाता चल
मेरी प्यास बुझाता चल ।
मधुर मधुर धुन गाता चल।
                    मन कितना चंचल है ! चलता नहीं, दौड़ता नहीं, छलांगें लगाता है! अभी अभी सारी श्रृष्टि में एकमात्र सजला सुफला के दुख की सोच रहा था तो दूसरे ही क्षण पूछ बैठा  ” बेवश कौन “

बे वश कौन
बे वश कहां होता है मन
वह तो रमण करता है
सुलगाकर आग कभी
या फिर डालकर पानी
        पीछे रह जाता है कौन !
एक खंडहर और एक कैदी
मिट्टी का एक गोला
न सोचे न समझ ही पाये
मन विना मैं कौन
       सब रह जाते हैं मौन !
करता था रखवाली जिसकी
अव वह छोड़ चला है 
रिक्त पड़ा देखता है शून्य 
रहता खुद से पूछता
              कोई बता मैं कौन !
फिर व्योम में मिलते हैं
मन को नया घर मिला
और घर को मिला नया मन
प्रश्न वहीं का वहीं खड़ा है
           अव बता तुम कौन !
यह रचना मेरी ४-६-२० की है। बीच बीच में आन लाइन कवि सम्मेलनों में भाग लेता रहा! एक की तो संचालन भी की। फेस बुक पर लाइव आकर कुछ गीत, कुछ कविताएं गाता और सुनाता रहा। चूंकि मैं कविता के साथ साथ कथा, लघु कथा, बीहनि कथा और संस्मरण भी मैथिली और हिन्दी दोनों भाषाओं में लिखता हूं, मैं ने कई गीत, कविता और बीहनि कथा मैथिली में भी लिखी जिनमें से अधिकांश विभिन्न प्लेट फार्मों पर काफी चर्चित रहे।
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी।

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