सन्नाटा और डर (हिन्दी कविता)

सन्नाटा और डर 

आज सन्नाटे के बीच  से जब 
विचर रहा था मेरा मन 
नाड़ी की गति पहचान रहा था 
सुन रहा था दिल की धड़कन 
मस्तिष्क चक्कर काट रहा था 
आकाश गंगाओं के बीच पड़ा मैं 
मंदाकिणियां निहार रहा था 
सौर मंडल के साथ ही 
मैं भी तो बस नचा रहा था 
ईन्द्रियां हुईं थी चंचल चंचल 
घनघोर अंधेरा छा रहा था 
कहने को सन्नाटा था 
अन्दर घनघोर घटा का साया था 
काले बादल घुमड़ रहे थे
बिजली की चमक डराती थी
मेरा मैं तो कांप रहा था 
ऐसा सन्नाटा नहीं चाहिये 
जो भय का चादर बुनता हो 
कान भले पक जाये मेरी 
शोर ही अच्छा लगता है। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 29-09-2019

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