लाल दीदी (मैथिली कविता)

लाल दीदी

अनुभवी मुखमंडल
प्रश्न सं भरल आंखि
जेना ज्योति बहराइत
टुकुर-टुकुर ताकि रहल छल 
अनवरत
हमरे दिश

बस मे बैसल छल
बाहर सं केओ बजौलकै
उतर' लागल
नज़रि हमरे दिश
टांगल, लटकल
' नेहरू' रौ.......!
नईं चिनलही ?
हम अवाक ।

के भ' सकैत अछि
मुदा छी मुग्ध
'नेहरू' जे बजौलक
हम हूं उतरि गेलहुं
फेर वैह प्रश्न
नहिं चिनलही ?

गोर लगलियै
पांझि मे भरि लेलक 
दुनू हाथें 
दुनू गाल थपथपेलक 
आंखि मे नोर 
हमरो, ओकरो 

अकस्मात लागल 
'ई' त' मायक स्पर्श 
मुदा ओ त' स्वर्गिय...
तखन 'ई' के 
एहन ममता, एहन दुलार 
कहिया भेटल रहै 
किछु स्मरण नहिं 
आश्चर्यित छलहुं 
कोनों सपना त' नहिं 

तखने ओ बाजल 
हम छियौ 
"लाल" दीदी 
आव चिनलही ?

गला भरि गेल 
स्वर मे थरथराहट 
कोनों तरहें बजलहुं 
हां, तीस बरस के बाद 
आई देखलियौ 
क्षमा करिहें 
तोरा सनक नजरि जे नहिं अछि ‌‌‍‍‌

पता नहिं ई गाड़ी ‌
कत्त तक जैत 
परन्तु आव 
चलत सना-सन
दना-दन 
दुनू गाल पर 
दीदीक थपथपाहट जे अछि ।

प्रमोद कुमार(नेहरू)
पांडिचेरी

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