हुनकर कौआ (मैथिली कविता)
हुनकर कौआ
चारि दिन सं नित्ये
एकटा झड़कल सन करिक्का कौआ
किचेन के खिड़की पर आवि बैसै छल
कखनो बाम त’ कखनो दहिन
नहिं त’ कखनो सोझे उपर निचा
मुरी डोलवै छल
जेना हमर मुँह दुसैत हुवै
ई के झड़कलहा ठाढ़ अछि
चुल्हा के सुइच उल्टा घुमबैया
आधा कांच आधा झड़कल
रोटी बनबैया
अपन अंगुरी जरबैया !
बकोर लागल छै ओकरा
एत’ त’ गृह लक्ष्मी ठाढ़ रहैत छलिह
चान सन मुँह ,रोलल रोलल बांहि
आ फुलल फुलल चाने सन रोटी
पांचम दिन सं ऐनाइ बन्द
चिकरै छियै
हे कौआ आऊ! रोटी देब
बिस्कुट देब
अहां हमर प्रियाक प्रिय छी
तैं हमरो प्रिय
मुदा ओ त’ रुसि पड़ैल
कहां अबैया ऊ कौआ!
चिकैर क’ कोना कहबै
एकटा कागज पर
लिख क’ टांगि देलियैया’
अहांक प्रिय दू मासक बाद
औतिह!
काश! ओ पढ़ि लियै'
आ फेर सं आबय लागै'!
प्रमोद कुमार पांडिचेरी
16-11-2019
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