बे वश कौन
बे वश कौन
बे वश कहां होता है मन
वह तो रमण करता है
सुलगाकर आग कभी
या फिर डालकर पानी
पीछे रह जाता है कौन !
एक खंडहर और एक कैदी
मिट्टी का एक गोला
न सोचे न समझ ही पाये
मन विना मैं कौन
सब रह जाते हैं मौन !
करता था रखवाली जिसकी
अव वह छोड़ चला है
रिक्त पड़ा देखता है शून्य
रहता खुद से पूछता
कोई बता मैं कौन !
फिर व्योम में मिलते हैं
मन को नया घर मिला
और घर को मिला नया मन
प्रश्न वहीं का वहीं खड़ा है
अव बता तुम कौन !
डॉ. प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,13-06-2020
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