केहन रोग ई लागल (मैथिली कविता)
केहन रोग ई लागल
प्रात होइत रूप जे निरखल जना स्वर्ग सं अप्सरा उतरल
सद्य:षोडसी कोम्हर सं अभरल एहन रूप नहिं देखल सुनल
चक्षु चंचल ओझड़ल कुंतल संधि पयोधरक उन्नत उभरल
सद्य: स्नाता उषा सदृश ओ अरुणिम भाल गात अति कोमल
वृक्क पर घैल छिछैल रहल छै बसन भीजि ऐना बनल छै
जं वसन बदन सं ससरै हृदय सम्हारब भेल बड़ भारी
तीतल बसन चरण छानै छै लट बिखैर क’ नयन झंपै छै
अपने मगन मादक इ नारी रोग लगौलक हमरा भारी
अहां निपुण माधव मुरली धर उर हमर कांपै अछि थर थर
करु उपाय हे लीला धर अंटकल हमर प्राण भेल भारी
विचलित मन ताप केहन इ की ओ प्यास बुझैत पानि ढ़ारि
बयस बितल मोन कियै रीतल इ कोन लीला हे गिरधारी
प्रमोद कुमार
पांडिचेरी ,17-11-2019
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