धुत तोरा के (मैथिली बीहनि कथा)

धुत तोरा के 
              लघु कथा (जन्माष्टमी पर विशेष) 

श्याम बाबू के हाले मे वियाह भेल छलन्हि। मिथिला वासी उत्साही युवक। मुदा कनि अंधविश्वासी। कृष्णाष्टमिक पर्व आवि रहल छलै। पत्नी फोन पर कहलखिन, “उज्जर धव धव धोती, मलमल के कुर्ता आ राजस्थानी  बरका नोंकी निकललहा जुत्ता पहिर क’  आयब। बड़ सख अछि हमरा। राधा मचैल क’ कहलखिन। श्याम की करताह।  मुंह सं अनायास निकललनि, “धुत तोरा के “!

      घर सं निकलले छलाह कि कियो पट द छीक देलकै। “धत्त तोरा के” कहि ओत्तहि रूकि गेलाह कनि काल। फेर चलला। रिक्शा पर बैस’ लगलाह कि ढ़ेके खुजि गेलन्हि। छौंरा सभ त’ बाटे तकैत रहै छै।  फफा क’ हंसि देलकै। बड्ड लाज लगलन्हि आ मुँह सं निकललन्हि, “धुत्त तोरा के “।

बस खुजै मे कनि देरी छलै। श्याम बाबू के एगो फिल्मी गाना एकाएक मोन पड़लन्हि, “पान खाये सैंयां हमार हो, मलमल के कुर्ते पे छींट लाले लाल “,बस आब की! एकटा स्पेशल पानक खिल्ली मुंह मे ध लेलाह। मोने मोने सोचलैथ, “राधा लाल लाल ठोढ़ देखती त’ बड़ खुश हेती “! बस चललै ! हिनका त’ मोने मोन लड्डू फुटनि।  मुँह पानक पीक सं भरि गेलनि।  ततवे मे कन्डक्टर पाइ मांग’  आवि गेलई। जै कि किछु बजै लै मुँह खोललाह कि सौंसे कुर्ता पर पिक खैस पड़लन्हि। मलमल के उज्जर धप धप कुर्ता भ गेलनि लाले लाल। सब एक्के संगें बाजि उठलै “धुत्त तोरा के “!

बस स्टाप सं पत्निक घर लगीचे छलन्हि । सोचलाह पैदले चलि जाइत छी। निकललाह। टटेलहा चमड़ा के राजस्थानी जुत्ता पैर काटि देलकन्हि। आव कोना चलताह! जुत्ता उतारि क’ हाथ मे ल’ लेलाह। जे देखै फफा क’ हंसि देई आ कहै, धुत तोरा के “! खैर पहुंचि गेलाह। मोन त आनंद विभोर! प्रिया मिलन के घड़ी जे आवि गेलै! केबार खुजलै। पत्नी चिचियेलखिन, “ई के आवि गेल! “धुत्त तोरा के “!!

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 23-08-2019

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