कतहु के नहिं रहलहुं (मैथिली कविता)
कतहु के नहिं रहलहुं
एकटा सपना
रोपा गेल
कतहु बहुत गहींर
मोन में
खूब ऊंच उड़ब
अकाश मे
बड़ पैघ भ' जायब
सबटा छोटे देखैत
कतेक मोन लगतै!
बैसल त' छी अकाश में
हाथ पैघ!
पहुंच दूर तक
मुदा ककरा लय
निचा सं जमीन
खिसकि गेल!
अकाश कहैया'
जमीन पर अपन घरारी देख
घरारी कहलक
तों के?
आव ने अकाश के
आ ने जमीने के
त्रिशंकु भेल लटकल छी
टटेलहा घेरा जकां!
प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,10-12-2019
Comments
Post a Comment