दाइल पी दाइल (मैथिली बीहनि कथा)
नौत पड़ना कतेको दिन भ' गेल रहै। आइ विजो भेलै । नथुनी कनि फिरेशान छथि,” मंगनू कहां गेल। ई सांढ़ हरदम भगले रहैया!”
तावत ओमहर सं मंगनूं दतमनि करैत आ फांड़ मे आठ दस गो अल्हुआ धेने आवि गेलै।अल्हुआ देखिते नथुनीक पारा डाउन! बेटा के कान मे किछु फुसफुसा क' कहलखिन आ फेर दुनु अपन अपन काज मे लागि गेलाह।
भोज खाइ काल बाप बेटाक पांत बदलि गेलै। नथुनी सं दू पांत पाछू मंगनूं के जगह भेटलै। नथुनी तामसे-पित्ते आगि । ई मचन्डा जानि क' दोसर पांत मे बैसल अछि। आइ चलह घर तों! आइ तोंहीं कि हमहीं!
मंगनू अपन बाबा बला बबजिया लोटा अनने रहै! रहि रहि ओकरे मुंह मे सटा घटा घट पीने जाइ!
बेर बेर नथुनी बेटा के इशारा कैलखिन मुदा के बुझैया' ! अपन तेल पियैल लाठी सेरियेलथि! आइ चलह तों घर!
घर पहुंचिते बाप मंगनूं के केश पकरि आ सोंटियाब' लगलखिन ! की भेलै? कियै मारै छै ,” मंगनूं के माय पुछलखिन!
अहि मचंडा के कहने रहियै, “ दाइल पिबिहें दाइल, भात त' घरो मे खैबें” मुदा ई मचंड घैलाक घैला पानि पीबि आवि गेल”
तों त' आन्हरे रहि गेलह ! हम त' लोटे लोटे दाइले पीलहुं आ देखहक एक लोटा मा'यो लै अनलहुं! आ तों त' हमरे ताकैत रहि गेलह!
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 15-05-2020
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