छैठ पावनि (मैथिली कविता)
छैठ पावनि
ढ़किया पथिया सूप आ कोनिञां
बड़का चंगेरा ,आ चंगेरी डगरी
धोआ सुखा क’ रखा गेलैया ‘
केराक बड़का घौर अएलैया’
आइ छियै खरना के पूजा
दादी काकी पीसी दीदिया
करती उपास सुमिरि छठि मैया
ई पावनि अछि बड़ भारी
क्षमा करब अपराध हे मैया।
घाट पटा कय साफ भेलैया ‘
केराक थम्भ रोपल गेलैया’
बिजलिक तार छै टांगल सौंसे
जेना व्योम मे तारा लटकैया'
घर मे पकलै ठकुआ खजूर
तहि पर सं भुसवा भरपूर
सबटा समेट क’ माथ पर जेतै
भुसबा देखै टाव नेवो के
टाव नेवो भुसवा के देखय
गुडकैया एम्हर ओम्हर ओ
मोने मोने हंसबो करै छै।
संझुका अरग स्विकारि क’ सुरुज
कम्बल ओढ़ि सूत’ गेलैया
बच्चा बूढ़ नहा सोना क’
जल्दी जेता घाट पर
पीसी कखनि पानि मे पैसली
थर थर कांपनि हाथ आ धर
जनि जाति सब गीत गवै छथि
नेना भुटका फुलझड़ी छोड़ै छथि
अरग सबटा सजा क’ राखल
सभक आंखि सुरुजे पर टांगल।
उगि गेला दीनानाथ दिनकर
अरग उठ’ लागल आव धर धर
बड़का पाबनि सम्पन्न भेलै आव
अंकुरी बिछ सब घर जेतै आव।
प्रमोद कुमार पांडिचेरी
01-11-2019
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