राइत (मैथिली कविता)

राइत 
राइत एलै त’ की भेलै ?
सौंसे कारी पोता गेलै!
भूत प्रेत सब जागि गेलै !
चमगादर उल्टा लटकि गेलै !
चोर बदमास ब्यभिचारी 
सभक भाग कि खुजि गेलै? 
की ओकरे सबलै राइत भेलै 
की सौंसे निराशा पसैर गेलै? 
पूछि क’ देखियौ ओहि बालक के
जनमिते काजक पाछू लगलै 
खग मृग तरु ओ जन्तु सबके 
पूछि क’ देखियौ ओहि मरीची के
बढ़लै आ बढ़िते गेलै 
नहिं रुकलै, नहिं बैसलै 
दू घोंट पाइनों नहिंयें पिलकै 
दिन भरि जरलै, कोयला भेलै 
आव राइत भेलै 
जेना माय’ के बांहि पसरि गेलै
प्रिया के जूड़ा बन्हा गेलै 
थारी विन्यास सं सजि गेलै 
सेजो कत्तेक गमैक गेलै 
नव उर्जा संचार भेलै 
अहि कारी माय’ के मुँह नहिं देखि
एकर गर्भ मे भरल ज्योति के देखियौ 
अपना कें भुतही बना क’ 
हमर मुँह चमकबैत देखियौ। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी 25-09-2019

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