घटा बिच चंदा (मैथिली कविता)

घटा बिच चंदा 

(18-05-2019 हमरा दुनुक विवाहक 32वां वर्षगांठक अवसर (अग्रिमे )
पर अपन अर्धांगिनी कें हमर तुच्छ भेंट) 

घनघोर   घटा  बिच  चमकै  चंदा,  ताकय   कखनो   काल  छै
चक्षु  द्वय  सं किरण  चला  कय',  करय   छै  हृदय  पर  घात  रे
लहरि घुमरि घन उपर जाइछै ,  पुनि लटकि लपटि मुख चुमै  रे
चमकय भाल बादर बिच झलफल, रहि रहि  दामिनि दमकय रे

मधुर  कंठ  सं  निकसल  वाणी, कोइलिक  भास  करावै  छै
दंत   पांति  मुख चमकै जहिना, दीपक थार सजाओल   रे
ग्रिव घिचल चमकल कुंदन दुहु कुण्डल , कमल सदृश दुहु चक्षु रे
दू शिखर हिमालय उर मध्य सोहय, मुदित मनोरम आजु  रे 

चंचल  मन पर्वत  बिच  तटिनी, छै नहिं पाथर  के  भान  रे
उपवन  एहन  कुसुम  भेलि  साखी , हिय  नहिं  कोनो  गुमान रे
धन्य हमर जीवन भेल  मधुमय , एहन  प्राणप्रिया  के  पावि  रे
कृपा करथि गुरु ईश पितर भवानी, सभ संगहिं श्वास प्रयाण रे। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 17-05-2019

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