अमर लत्ती (मैथिली बीहनि कथा)
अमर लत्ती
( मैथिली बीहनि कथा)
बुधनी काकी के सब अमर लत्ती कहै छैन्ह। छथिनहों तेहने। गोटैके दिन हुनकर चुल्हा जरै छैन्ह! सब दिन अनके आश! एकटा बेटी छैन्ह सेहो सासुर बसै छै। बेटा सोलहवें बर्ष मे घर सं भागि गेलै। सब कहै जे गुदड़िया बाबा बनि गेलै, त’ नागा बाबा बनि गेलै। इमहर माय एकदम बेलल्ला । टोला भरिक हाट- बजार, टहल- टिकोरा कय गुजर चलबै छलखिन! रोटी जनेरक होइ कि मरुवा के, भात तीन दिनक बासी होइ कि ताड़ी सन डहकैत दालि, खूब प्रेम सं खा लैत छलखिन। मजाल जे कहियो माथो दुखानि!
आइ किम्हरो सं एकटा बबाजी कोनटा लग आवि क' गीत गावि गावि भीख मांग' लगलै! “ दोहाइ भोले नाथ की! हम अघोरी! बुढ़िया आइ हम तोरा सं भीख लैये क' जेबौ!”
बाबा! “ हम त' अपने अमर लत्ती छी। दोसरा के भरोसे पेट पोसै छी! हम कत' सं भीख देब! माफ करू!”
“नहिं बिना तोहर हाथे भीख लेने हम नहिं जैब।दूइयो टा दाना दे बुढ़िया”, बबाजी कड़ैक क' बजलै!
बुधनी काकी सभक घरे घर निहोरा कय अएली मुदा क्यो दू पाइ कि दू दाना नहिं देलकैन्ह! आखिर मे पवना माय लग जा क' खेखनियां करय लगलखिन! “ अहीं दया करू कनिञां! अहीं के सबसं पहिने टहल कय देब”, ई कहि हुनकर पायर जांत' लगलखिन बुधनी काकी। बैसाखक मास! गर्मी पड़ै! पवना माय के पैर जंतबैत जंतबैत स्वास पड़लन्हिं आ ओ बैसले बैसले सुति रहलखिन!
निराश बुधनी काकी जखन अपन कोनटा लग अएलीह त' बबाजी त' निपत्ता ! सांझ मे सब कह' लगलै जे ओ बुधनी काकी के बेटा छलनि! सिद्धी के लेल माय' सं भीख मांग' आएल रहै! भीख नहिं भेटलै! आब ओ पागल भ' जेतै आ नहिं त' आत्महत्या ….!
दोसर दिन प्रातहि सं सब बुधनी काकी के तकने फिरै छैन्ह मुदा हुनकर कोनो थाह ठेकान नहिं!
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,29-12-2019
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