प्रेम (हिन्दी कविता)
प्रेम
प्रेम अगन है प्रेम मगन है प्रेम तो बड़ी है पूजा रे
प्रेम तपन है प्रेम जोगन है प्रेम मगन ईक राधा रे
बिन मुरली धुन प्यासी राधा प्यास गहरी है लीला रे
प्रेम दिवानी मीरा रानी बदली अमृत बिष प्याला रे
सूर है सबसे प्यारा प्रेमी बिन नयनन सब देखत रे
कृष्ण की लीला सूर से ज्यादा किसने कब है देखा रे
लोचन हीन दिखता जग सारा यही तो प्रेम की ज्योति रे
पिघला दे पाथर को ईश बनाकर यही प्रेम की शक्ति रे
विन मदिरा के पागल हो प्रेमी कैसा यह मधुशाला रे
प्रेम विरह है प्रेम मिलन है प्रेम ही कृष्ण सुदामा रे
प्रेम के गांठ में सब बंधा है क्या जननी क्या दाता रे
प्रेम के रस में डूबो प्राणी प्रेम अमृत का प्याला रे
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी
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