अरहुलिया (मैथिली लघुकथा)
अरहुलिया
(बीहनि कथा)
मांगल -चांगल छल अरहुलिया। रवि मड़ड़ आ घुरनी काकी के बियाह भेना बारह बरख भ गेल रहनि। मुदा संतानक सुख सं बंचित रहथि। लोक सभ की की ने कहनाई शुरु क’ देने रहै। घुरनी काकी सभ देवता पितर के सुमिर क’ देख लेलखिन। कोख नहिं सजलैन्ह।
रवि मड़ड़ के सभ कहनि, “दोसर घर क’ लै”।मुदा नहिं।
रवि मड़ड पढ़ल -लिखल त’ रहथि कमे वेश मुदा धर्म -कर्म, बात-ब्यबहार मे सभस ‘आगां। तैं सभ हुनका माइनजन बनौने छल।
भगवतिक बड़ पैघ भक्त, तैं अपन घर मे सभ सं अलग, भगवतिये के स्थापित कैने रहथि। नित दिन भगवतिक पिढ़ी निपलाक उपरान्ते अन्न ग्रहण करथि। कत्तहु सं, नियम सं एकटा अरहुलक फूल भगवती के निश्चित चढ़ाबथि ।
किछु समयक उपरांत हुनका घर मे साक्षात भगवतियेक रुप एकटा कन्याक जन्म भेलै।
खुशिक सीमा नहिं। रवि मड़ड़ के त’ जेना सात जन्मक फल भेट गेलैन्ह। रहि रहि आनंद विभोर भ’ जाथि। आंइख भरि जानि।
हुनका विश्वास रहनि जे भगवती के नित अरहुलक फूल चढ़ौलाक प्रसाद रुपें हुनका संतानक दर्शन भेलैन्ह, तैं ओकर नाम ‘अरहुल’ राखि देलखिन। काइल्हक अरहुल आव अरहुलिया भ’ गेल।
मड़ड़ ओकरा उच्च संस्कार देलखिन्ह। रामायण, महाभारत, गीता, पुराण... जे जे पढ़ने आ सुनने रहथिन्ह, सभ ओकरा मस्तिष्क मे भरि देलखिन। अरहुलियो देखवा मे जहिना भगवतिक प्रतिरुप तहिना पढ़ैयो मे साक्षात सरस्वतिये छल। सभटा माथ मे सजौने गेल।
हाले मे ओकर बियाह भेलै। सुखी समपन्न घर। विद्याक ओतेक चलन नहि।
आई विदागरी छै। मड़ड़ भोरे सं मोने मोन कनैत छथि। रहि रहि फफैक उठैत छथि। चट द’ तौनी सं आंइख पोइछ लै छथि। केओ देखै नहि। खास क’ अरहुलिया।
विदाक काल मड़ड़ के भरल गला सं थरथराइत यैह शब्द निकललैन्ह, “बच्चा हमर देल संस्कारक मान राखब”!
अरहुलियो पिताक दुख के ध्यान मे राखैत ,मौलायल किन्तु ठोस भ ‘बाजलि, “मरितो दम तक हम अहांक शिक्षाक मान राखब... बाबू! “ आ’ फफकि परल! मड़ड़ के नहिं रहल गेलैन्ह। मुंह घुमा लेलैन्ह।
हृदयक टुकड़ा चलि गेलैन्ह। बेटी बिदाइक दुख केओ बाप के हृदय मे पैस क’ देखै!
सासुर अबिते अरहुलिया पर जेना पहाड़ टूटि पड़लै। पांच गोटेक परिवार। साउस अपंग आ ससुर बबाजी।
पांच छ: बीघाक खेती -पथारी। गाय’,महींस। एक जोड़ा बरद। खाइत -पियैत परिवार। एगो ननदि। सेहो सासुर बसैत। दू टा दियौर। लोक सभ बड़ निक मुदा कमाइ मे भूत। घरवला भोरे जे खेत पर जाई, से पहर बितैत सांझ क’ घर अबै।
बेचारी अरहुलिया! कत’ मायक घर मे एकटा खढ़ नईं उसकावै, आ एत्त काजक बोझ तरे पिसायल जाय। देखैत देखैत कोना साल बित गेलै से पता नहिं। एका एक ,एक दिन अरहुलिया के मोन केनादन कर’ लगलै। जी मितलाई। आई -माई सभ कहलखिन्ह, “कनियां के पैर भारी छै। “जत्ते दाई-माई ओतवे सलाह। हे ई खायब कनियां! हे ईसभ नहिं खायब। एना चलव, एना उठब, एना बैसब... सलाहक ओर छोर नहिं।
सभ कहि सुनि क’ चलि गेलिह। एमहर कनियांक हाल ओहने के ओहने।
कोनो तरहें समय पूरा भ’ गेलै।
आई अरहुलिया के मोन बड़ खराब छै। भोरे सं सांस उपरे उपरे क’ रहल छै। छातियो जोर जोर सं धड़ैक रहल छै। अरहुलियाक मरद अखन संयोग सं घरे पर छलै। आई -माई के बजौलक। ता धरि अरहुलिया बेहोश भ’ गेल रहै। डाक्टर के बजाओल गेल।।
डाक्टर जंचलाक बाद डांटि क’ कहलकै, “हिनकर हालत बड़ खराब छनि। पीलिया बड्ड बढ़ल छनि। आव भगवाने के आश।
कनि कालक बाद अरहुलिया के होश आवि गेलै। मुदा लगै जे आव चिड़िया उरि जेतै।
एकाएक बाबू याद ऐलखिन्ह। फोन कर’ चाहल परन्तु सोचलक जे थरथरायल आवाज सुनि बाबू के नहिं जानि की हाल हेतैन्ह। चिट्ठिये लिख दै छियनि।
“पूज्य बाबूजी! प्रणाम! हमर हालत ठीक नहिं अछि। कखनों चिड़िया उड़ि जायत। अहिंक शिक्षाक अनुसार चललहुं। सभ के सुख दै के हर सम्भव प्रयास कैलहुं। अविते गृहस्वामिनी बनि गेलहुं। सभ कोई बड्ड निक छथि। हमरा भाग्य मे एतबै सुख लिखल छल। कोनो मलाल नहिं। फेर जन्म लेव। अहींक घर मे। अहि जनम मे अहां सभक सेवाक पुण्य नहिं भेटल। वैह पूरा कर' आयब। “
पूज्य माय के हमर चरण स्पर्श!
अहिंक दुलारू
अरहुलिया
लेखक—प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पॉंडिचेरी, 06-02-2019
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