आद्रा बरसि डेली (मैथिली कविता)
आद्रा बरसि गेलई
नील आंचर पर
कारी पसरि गेलई
ढ़न ढ़न ढोल पीट
बिजली चमकि गेलई
झम झम झम क'
आद्रा बरसि गेलई!
फाटल बेमाय मे
मलहम लागि गेलई
चाकर दरारि आव
फेर सं जुड़ि गेलई
आशा जनमि गेलई
स्वाति नक्षत्र मे जेना
चातकक मुँह मे
मोती बनैछै
धरतिक कोख मे
बीया पनघि गेलई!
अन्न उपजतै
खग मृग जगतै
गाय’ महिंस करतै पाऊज
धिया पुता नचतै
घर द्वार चमकतै
चमकि जेतै गृहणिक आंखि
हे रौ करिया
घुमि घुमि अबिहें
पझाय नहिं जाय ई आश!
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 23-06-2019
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