तुम ही तुम हो (हिन्दी कविता)

तुम ही तुम हो

जेहन में बैठा
आंखों के पर्दे पर छाया 
मोती बने भाप को
गालों पर टघरने से रोकता 
सांसों में  गर्मी भरता 
होंठों पर  लाली लाता 
मंद समीर के छुअन में बसकर 
गेसुओं को छेड़ता, उनसे खेलता 
मुरझाये चेहरे पर मुस्कान 
बिखराता
हर पग के उठने पर
साथ में चलता 
वर्षा की बूंदों में  चमकते 
सत रंगी रेशम रेशम 
मचलते लिपटते स्पंदन के 
अनुभूति में  कौन है
हर पुष्प में बसे सुगंध में 
तेरा ही बास है 
हे प्रिय !  पहले सात समुन्दर पार थे
या अव आसमानों के पार 
हर सांस में  तुम हो 
दिल के हर धड़कन में 
तेरा ही एहसास है। 

प्रमोद कुमार 
पांडिचेरी, 24-07-2019

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